पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत को बांग्लादेश में कैसे देखा जा रहा है?
इस इंटरएक्टिव कंटेंट को देखने के लिए जावास्क्रिप्ट वाली एक आधुनिक ब्राउज़र और बेहतर इंटरनेट कनेक्शन की ज़रूरत है. इमेज स्रोत, Samir Jana/Hindustan Times via Getty Images पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जीत को लेकर बांग्लादेश की राजनीतिक पार्टियों के भीतर भी कई तरह की चर्चा और विश्लेषण चल रहे हैं. राज्य में क़रीब डेढ़ दशक बाद ममता बनर्जी के सत्ता से बाहर होने और पहली बार बीजेपी के आने को लेकर बांग्लादेश में भी काफ़ी उत्सुकता है. साथ ही तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे, सीमा से जुड़े मुद्दों और 'पुश-इन' या 'पुश-बैक' जैसे द्विपक्षीय सवालों पर अब राज्य सरकार की क्या भूमिका होगी, इसको लेकर भी बांग्लादेश की पार्टियों में चर्चा, जिज्ञासा और चिंता है. भारत अक्सर ये आरोप लगाता रहा है कि कुछ लोग अवैध रूप से बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ करते हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले बीजेपी के कुछ नेताओं के बयानों को लेकर बांग्लादेश में चिंता जताई गई थी. बांग्लादेश में ही कई लोगों ने ये आशंका भी जताई है कि भारतीय नागरिकों को 'बांग्लादेशी' बताकर बांग्लादेश भेजने की कोशिशें बढ़ सकती हैं. बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि चुनाव से पहले बीजेपी के कुछ नेताओं ने बांग्लादेश पर ऐसे बयान दिए जो दोनों देशों के रिश्तों के लिए नुक़सानदेह हो सकते हैं. हालांकि, बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में कोई भी सरकार बने, इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. शेख़ हसीना सरकार के अगस्त 2024 में गिरने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंध काफ़ी तनावपूर्ण हो गए थे, जो अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं. तब से बांग्लादेश की कुछ राजनीतिक पार्टियां आरोप लगाती हैं कि भारत वहां की अंदरूनी राजनीति पर प्रभाव डालने की कोशिश करता रहा है. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमलों, भारत में बांग्लादेश मिशन पर हमले, भारतीय उत्पादों के बहिष्कार की मांग, ढाका में भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र पर हमले, वीज़ा सेवाओं में ठहराव, व्यापारिक सुविधाओं में कटौती, और भारत में टी-20 वर्ल्ड कप क्रिकेट खेलने से बांग्लादेश क्रिकेट टीम के इनकार करने जैसी कई घटनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को निचले स्तर तक पहुंचा दिया था. हालांकि, बांग्लादेश में फ़रवरी में हुए आम चुनाव के बाद दोनों देशों ने संबंध सुधारने की कोशिशें शुरू की हैं. बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान दिल्ली का दौरा भी कर चुके हैं. दौरे से पहले, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने पत्रकारों से कहा, "यह बांग्लादेश और भारत के बीच एक नया संबंध है." इससे पहले शेख़ हसीना की अवामी लीग सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंध बेहतर माने जाते थे, लेकिन इस दौरान तीस्ता नदी के जल बंटवारे का मुद्दा सुलझ नहीं पाया था. ममता बनर्जी लगातार इसका विरोध करती आई हैं. तीस्ता नदी के जल बंटवारे का मुद्दा भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से चला आ रहा एक अहम विवाद है. नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी) के प्रवक्ता आसिफ़ महमूद ने बीबीसी बांग्ला से कहा कि पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले बांग्लादेश को लेकर दिए गए बीजेपी नेताओं के कुछ बयान चिंताजनक थे और इनका असर यहां (बांग्लादेश में) भी पड़ सकता है. उन्होंने कहा, "चुनाव से पहले वहां के कुछ नेताओं ने अलग-अलग समय पर बांग्लादेश और बांग्लादेश के लोगों के बारे में चिंताजनक टिप्पणियां की हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है. हमारी पश्चिम बंगाल के साथ लंबी सीमा है और संबंधों का स्तर बहुआयामी है. ऐसे में अगर इस तरह की टिप्पणियां सामने आती रहती हैं, तो इसका असर इस देश में भी पड़ सकता है." जमात-ए-इस्लामी के महासचिव मिया गोलाम परवर का कहना है कि पश्चिम बंगाल चुनाव का बांग्लादेश की राजनीति पर असर नहीं पड़ेगा. वो कहते हैं, "हालांकि, उनका हिंदुत्व और सांप्रदायिकता की राजनीति हमारी चिंता का बड़ा कारण है. वे अपने राज्य के धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का पालन नहीं कर रहे हैं. उन्हें मुसलमानों पर अत्याचार बिल्कुल भी दिखाई नहीं दे रहा है. अगर भारत धर्मनिरपेक्ष होता, तो अन्य धर्मों के लोग सुरक्षित होते." एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "अवामी लीग ने भारतीय राज्य और सरकार की मदद से ताकत हासिल की थी और शेख़ हसीना उनके संरक्षण में हैं. बीजेपी सरकार उनकी मदद कर रही है. अब वे और अधिक संरक्षण पाकर अपनी साज़िश बढ़ा सकती हैं." हालांकि, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार और बांग्लादेश नेशनिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ संयुक्त महासचिव रूहुल कबीर रिज़वी का कहना है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है और वहां के लोगों ने मतदान के ज़रिए अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल किया है. उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "क़रीबी पड़ोसी होने के नाते दोनों देशों के संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं. हम मानते हैं कि जो भी सत्ता में हो, दोनों देशों के संबंध आगे बढ़ेंगे और इससे लोगों को फ़ायदा होगा. दोनों देश निश्चित रूप से आपसी सहयोग के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाएंगे." कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य मुजाहिदुल इस्लाम सलीम का कहना है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के साथ एक सांप्रदायिक ताकत सत्ता में आई है और यह भी सच है कि बांग्लादेश में भी ऐसी ही एक सांप्रदायिक ताकत मौजूद है. उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "हालांकि मेरा मानना है कि दोनों देशों के आम लोग लोकतंत्र और गैर-सांप्रदायिकता के आधार पर समाज को आगे बढ़ाएंगे." इस बीच, बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार में चाहे जो भी सत्ता में हो, बांग्लादेश लंबित मुद्दों को हल करने के लिए उसी दृष्टिकोण के साथ काम करेगा और बातचीत के ज़रिए समाधान की कोशिश करेगा. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
स्रोत: BBC Hindi