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Death

ईरान के शीर्ष नेताओं की मौत के बाद देश की कमान किसके हाथ में?

✍️ Admin 📅 26 March, 2026 ⏰ 08:38 PM 👁 63 views

इमेज स्रोत, Tauseef MUSTAFA / AFP via Getty Images अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई दफ़ा कह चुके हैं वे ईरान से बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने इस बात का ज़िक्र तो नहीं किया कि उनकी बातचीत किससे हो रही है, लेकिन इतना ज़रूर कहा 'सही लोगों' से वार्ता कर रहे हैं. इसके बाद विदेशी मीडिया ने बताया कि ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़लीबाफ़ ही वह शख़्स हैं, जिनसे वॉशिंगटन बातचीत कर रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान को असल में कौन चला रहा है? दरअसल, ट्रंप के लिए वेनेज़ुएला ऐसा मॉडल बन गया था, जिसके प्रमुख को हटाते ही सारी व्यवस्था धाराशायी हो गई. लेकिन ईरान बाकी तानाशाही देशों से अलग है. यहां किसी एक व्यक्ति के जाने से उलटफेर या बड़े बदलाव नहीं होते. ईरान के विशेषज्ञों का कहना है कि देश की व्यवस्था कुछ इसी तरह बनाई गई है कि ऐसे झटकों को झेला जा सकता है. ईरान में अब जो सिस्टम प्रभावी है, वह सैन्य रुझान रखता है और ख़ास पारदर्शी नहीं है. ताक़त अब एक छोटे समूह में सिमटी हुई दिखती है, इनमें धार्मिक नेता, राजनीतिक लोग और इस्लामिक गार्ड कोर (आईआरजीसी) के वरिष्ठ कमांडर शामिल हैं. ईरान में भले ही एक औपचारिक व्यवस्था हो, लेकिन युद्ध जैसी स्थिति में फ़ैसले सुरक्षा संस्थाएं और सैन्य पृष्ठभूमि वाले लोग ले रहे हैं. विशेषज्ञों की राय में यह एक 'मोज़ेक' शैली की व्यवस्था है, जो सैन्य और सरकारी कामकाज को अलग रखती है. ताकि अमेरिका‑इसराइल वरिष्ठ अधिकारियों को मार दे तो भी सिस्टम चलता रहे. ईरानी अधिकारी और मीडिया जनता को भरोसा दिला रहे हैं कि वरिष्ठ कमांडरों और अधिकारियों के कई विकल्प पहले से ही मौजूद हैं. इमेज स्रोत, Morteza Nikoubazl/NurPhoto via Getty Images औपचारिक रूप से तो ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई हैं. यह पद अब भी ईरान में सबसे ताक़तवर है. इस पद पर आसीन व्यक्ति सेना, न्यायपालिका और अहम संस्थाओं पर अधिकार रखता है. लेकिन मोजतबा की पकड़ कमज़ोर दिखती है, क्योंकि वह सार्वजनिक रूप से नज़र नहीं आ रहे और उनके घायल होने की ख़बरें भी हैं. शासन करने या कूटनीति का कम अनुभव होने की वजह से मोजतबा के लिए इस कठिन समय में महत्वपूर्ण फ़ैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इससे यह धारणा बनी है कि भले ही उनके पास संवैधानिक अधिकार हैं, लेकिन युद्ध के दौरान रोज़मर्रा के फ़ैसले वरिष्ठ अधिकारी और कमांडर ले रहे हैं, जिनमें से कई आईआरजीसी से जुड़े हैं. नाम के लिए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ज़रूरी भूमिका में हैं, जिनको मज़बूत और एकजुट करने वाले चेहरे के रूप में दिखाया जाता है. लेकिन असल कामकाज बाकी नेताओं और सैन्य अधिकारियों के सामूहिक फ़ैसलों पर टिका है. इसी वजह से ख़ातम अल‑अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर और अहम हो गया है, जो आईआरजीसी और सेना के बीच तालमेल देखता है. आईआरजीसी लंबे समय से ईरान की व्यवस्था का अहम हिस्सा है. मौजूदा संकट में इसका महत्व और भी बढ़ गया है. यह बीते दशकों में एक ताक़तवर सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति बन चुकी है. आईआरजीसी ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, बाहरी ऑपरेशन और घरेलू सुरक्षा पर नज़र रखती है. ख़ामेनेई की मौत के बाद आईआरजीसी ने व्यवस्था को स्थिर करने और नेतृत्व बदलने में अहम भूमिका निभाई. कई जानकार मानते हैं कि नए सर्वोच्च नेता की नियुक्ति में भी इसका रोल अहम रहा. आईआरजीसी के मौजूदा और पूर्व कमांडर संसद, सुरक्षा तंत्र और सरकार के अलग‑अलग हिस्सों में गहराई से जुड़े हुए हैं. लिहाज़ा, आईआरजीसी का नेटवर्क बहुत मज़बूत है. ईरान की ज़रूरत की वजह से आईआरजीसी की अहमियत बढ़ गई है. इसके पास कई कमांडर और अधिकारी हैं जो मारे गए लोगों की जगह ले सकते हैं. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आईआरजीसी औपचारिक रूप से सत्ता में नहीं है, लेकिन पर्दे के पीछे सबसे ताक़तवर बन चुकी है. इमेज स्रोत, Morteza Nikoubazl/NurPhoto via Getty Images मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. ईरान के कई टॉप नेताओं और कमांडरों के मारे जाने के बाद ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़लीबाफ़ उन चेहरों में से एक हैं, जिन्हें विश्व पटल पर पहचाना जाता है. वो 1994 से 2000 तक आईआरजीसी कमांडर रहे. 2000 से 2005 तक नेशनल पुलिस चीफ़ बने. 2005 से 2017 तक तेहरान के सबसे लंबे समय तक मेयर रहे. 2020 में संसद के स्पीकर बने. उन्होंने तीन बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, 2005 में चौथे स्थान पर रहे, 2013 में दूसरे स्थान पर और 2017 में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली. जबकि 2024 के चुनाव में वे तीसरे स्थान पर रहे. ग़लीबाफ़ पर लंबे समय से भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अदालत में कभी साबित नहीं हुए. मौजूदा संकट में ग़लीबाफ़ को एक मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है, जो राजनीति से जुड़े लोगों, धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोगों और सुरक्षा तंत्र के बीच तालमेल बैठा सकता है. हमलों से पैदा हुई उथल‑पुथल में उन्होंने कोऑर्डिनेटर की भूमिका निभाई है. हालांकि, उनकी अहमियत को ज़्यादा बढ़ा‑चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए. बाहर के देशों में यह अटकलें हैं कि वो बातचीत के लिए अहम व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि उनके पास पर्याप्त सैन्य या धार्मिक ताक़त नहीं है कि वो अकेले ही सबकुछ तय कर पाएं. इमेज स्रोत, Anadolu via Getty Images राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन सरकार चलाने और रोज़मर्रा का काम देखने के लिए औपचारिक रूप से ज़िम्मेदार हैं. लेकिन उनका रोल अब सीमित होता दिख रहा है. आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद वो एक अंतरिम नेतृत्व की टीम का हिस्सा ज़रूर रहे थे. लेकिन युद्ध की स्थिति और सुरक्षा संस्थाओं का बढ़ता दबदबा चुनी हुई सरकार के असर को कम कर रहा है. नए सर्वोच्च नेता के आने के बाद सरकार की संवैधानिक अहमियत भी घट गई. बहुत लोग मानते हैं कि पेज़ेश्कियन की रणनीतिक फ़ैसलों में भूमिका पहले से ही सवालों के घेरे में थी, अब वो और किनारे कर दिए गए हैं. ख़ासकर रक्षा और विदेश नीति से जुड़े फ़ैसलों में उनका दख़ल न के बराबर है. विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची को अमेरिका और पश्चिमी देशों से बातचीत का लंबा अनुभव है. वह पहले न्यूक्लियर नेगोशिएटर भी रह चुके हैं. उन्होंने हमेशा कोशिश की है कि विदेश मंत्रालय और आईआरजीसी की ताक़त के बीच संतुलन बना रहे. लेकिन असली रणनीति उनके स्तर पर तय नहीं होती. यह काम ईरान की सर्वोच्च सुरक्षा संस्था, "सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल" करती है. इमेज स्रोत, Burak Kara/Getty Images सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल युद्ध और शांति दोनों में बेहद असरदार है. इसका काम राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति तय करना, रक्षा और ख़ुफ़िया मामलों का तालमेल करना है. इसे राष्ट्रपति की अध्यक्षता में चलाया जाता है और इसमें वरिष्ठ मंत्री, सेना, न्यायपालिका, संसद के लोग और सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. लेकिन इसके फ़ैसले सर्वोच्च नेता की मंज़ूरी से ही लागू होते हैं. इसी काउंसिल ने ही ख़ामेनेई की मौत के बारे में जानकारी दी थी. युद्धकाल की आधिकारिक जानकारी भी दी थी. इससे उसकी ताक़त साफ़ दिखती है. जून 2025 की 12 दिन की जंग के बाद बना 'डिफ़ेंस काउंसिल' भी युद्ध के समय अहम भूमिका निभाता है. इसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, तीनों शाखाओं के प्रमुख, सर्वोच्च नेता के दो प्रतिनिधि और बड़े सैन्य कमांडर शामिल हैं. ईरान के सिस्टम में कुछ और लोग भी ताक़तवर हैं, जिनमें से अधिकतर आईआरजीसी से जुड़े हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

स्रोत: BBC Hindi

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