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ईरान की जंग में साइबर वॉरफ़ेयर की क्या है भूमिका

✍️ Admin 📅 13 March, 2026 ⏰ 02:37 PM 👁 74 views

जहाँ तक सैन्य ताकत की बात है, तो अमेरिका और इसराइल यह बताने में संकोच नहीं करते कि वे ईरान पर कैसे हमला कर रहे हैं. पेशेवर तस्वीरों और आकर्षक वीडियो के साथ, यूएस सेंट्रल कमांड हर कुछ घंटों में सोशल मीडिया पर उन हथियारों और लड़ाकू विमानों के बारे में पोस्ट कर रहा है जिनका इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन साइबर स्पेस में क्या हो रहा है, इस बारे में अमेरिका और इसराइल कहीं अधिक सतर्क हैं. कई घंटों की प्रेस कॉन्फ्रेंस, भाषणों और दर्जनों सोशल मीडिया पोस्ट के दौरान साइबर ऑपरेशनों का ज़िक्र बेहद कम है. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें लेकिन इस युद्ध में साइबर स्पेस की अहम भूमिका है. इसका संकेत यूएस सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने हाल ही में एक प्रेस अपडेट में दिया था. उन्होंने कहा, "हम समुद्र की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष और साइबर स्पेस तक ईरान पर हमले जारी रखे हुए हैं." तो आइए ये जानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह के साइबर ऑपरेशन किए जा रहे हैं और इससे नए दौर की जंग के बारे में क्या संकेत मिलता है. इमेज स्रोत, AFP via Getty Images मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. साइबर जासूसी और हैकिंग को युद्ध की तैयारी में तथाकथित "प्री-पोजिशनिंग" में बड़ी भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है. पेंटागन में जॉइंट चीफ्स ऑफ़ स्टाफ़ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि युद्ध के लिए महीनों, और कुछ मामलों में सालों की योजना बनाई गई. इसमें हमलों के लिए तथाकथित "टारगेट सेट" तैयार किए गए. संभव है कि अमेरिका और इसराइल के हैकर किसी वास्तविक हमले की योजना बनने से बहुत पहले ही ईरान के अहम कंप्यूटर नेटवर्क में घुसपैठ कर चुके होते हैं. हवाई रक्षा प्रणाली या सैन्य संचार के पीछे काम करने वाले कंप्यूटर नेटवर्क इन हमलों का सबसे बड़ा लक्ष्य रहे होंगे. फ़ाइनेंशियल टाइम्स को नाम न बताने की शर्त पर सूत्रों ने बताया कि इसराइल ने सीसीटीवी और ट्रैफिक कैमरों को हैक करके एक बड़ा निगरानी नेटवर्क बनाया था, ताकि आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और उनके कमांडरों की रोज़मर्रा की गतिविधियों के पैटर्न को समझा जा सके. यह उस हमले की तैयारी का हिस्सा था अली ख़ामेनेई की मौत हुई. साइबर सुरक्षा कंपनी चेक पॉइंट के थ्रेट इंटेलिजेंस विशेषज्ञ सर्गेई शाइकेविच ने कहा कि इंटरनेट से जुड़े कैमरे साइबर युद्ध में निशाना बन गए हैं क्योंकि वे "बहुत कम लागत पर सड़कों और इमारतों की रियल टाइम जानकारी देते हैं." विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की जानकारी का ग्राउंड पर मौजूद जासूसों से मिलने वाली पारंपरिक ख़ुफ़िया जानकारी से मिलान किया जाता है. पूर्व इसराइली सैन्य साइबर रक्षा विशेषज्ञ और साइबर सुरक्षा प्लेटफॉर्म रेमेडियो के संस्थापक ताल कोलेंडर ने कहा, "साइबर आम तौर पर अपने आप में निर्णायक हथियार नहीं होता. लेकि यह आपकी ताक़त को कई गुना बढ़ाता है और जमीन पर चल रहे अभियानों को समर्थन देता है." शुरुआती हमलों के बाद हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जनरल केन ने बताया कि यूएस साइबर कमांड और यूएस स्पेस कमांड के कर्मचारी सबसे पहले सक्रिय हुए थे. इन्होंने ईरान की देखने, संचार और प्रतिक्रिया देने की क्षमता को बाधित किया और उसे लगभग अंधा कर दिया. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आयतुल्लाह की सुरक्षा टीम को आने वाले जेट विमानों की चेतावनी न मिल सके, इसके लिए तेहरान के मोबाइल फ़ोन टावरों को जाम किया गया या बंद कर दिया गया. इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ऐसा यूक्रेन में हो चुका है. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा कि ईरानी सैनिक "हमला करना तो दूर आपस में बात नहीं कर पा रहे." ये टिप्पणियां राष्ट्रपति ट्रंप के उन शब्दों की याद दिलाती हैं जब उन्होंने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण की सफलता की तारीफ़ की थी. उन्होंने उस अभियान के बाद कहा था, "हमारे एक खास हुनर के कारण काराकास की बिजली काफ़ी हद तक बंद कर दी गई थी." यह पुष्टि नहीं हुई है कि राष्ट्रपति साइबर हमले की बात कर रहे थे या नहीं, लेकिन हाल ही में प्रकाशित अमेरिकी साइबर रणनीति में उन्होंने उस विशेष अभियान के लिए अपनी साइबर फ़ोर्स की तारीफ़ की. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने "एक बेदाग सैन्य अभियान के दौरान अपने विरोधियों को अंधा और भ्रमित कर दिया." इसराइल पर यह आरोप भी लगाया गया है कि उसने ईरान में नमाज़ का वक़्त बताने वाली एक लोकप्रिय ऐप बादेसबा को हैक किया, जिसे 50 लाख बार डाउनलोड किया गया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही बम गिरने शुरू हुए, इस एप के यूज़र्स को एक पुश नोटिफिकेशन भेजा गया जिसमें लिखा था, "मदद पहुंच गई है." अमेरिकी रक्षा मंत्री हेगसेथ ने इस हफ़्ते कहा है कि अमेरिका ने और सिस्टम खोजकर उन्हें नष्ट करने का अभियान जारी रखा है. युद्ध के इस चरण में साइबर की भूमिका हो सकती है, जहां ऑपरेटिव, ओपन सोर्स इंटेलिजेंस, सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण और साइबर जासूसी का इस्तेमाल करके ईरान में सैन्य लक्ष्यों का पता लगा रहे हों. संभावना है कि इस काम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा हो. इसका एक संभावित संकेत भी हेगसेथ की टिप्पणी से मिला, जब उन्होंने एक खुफिया अधिकारी की प्रशंसा की जिसे उन्होंने काम करते देखा था. उन्होंने कहा, "मैं एक युवा कर्नल से बात कर रहा था जो इस पर काम कर रहा है कि हम लक्ष्य कैसे तय करते हैं और ईरान जो करने की कोशिश कर रहा है उसके अलग-अलग पहलुओं को कैसे खोजते हैं." इमेज स्रोत, AFP via Getty Images अमेरिका और इसराइल का ईरान के ख़िलाफ़ बड़े साइबर हमले करने का लंबा इतिहास रहा है लेकिन दोनों देश इस बारे में बेहद गोपनीय रहते हैं. उदाहरण के लिए, साल 2010 में ईरान की यूरेनियम संवर्धन सुविधाओं पर हुए चर्चित और विनाशकारी स्टक्सनेट हैक के बारे में अधिकारी अब भी खुलकर बात नहीं करते. साल 2022 में भी इसराइल पर आरोप लगा कि उसने हैक्टिविस्ट समूह प्रिडेटरी स्पैरो के नाम पर ईरान के स्टील प्लांट में तकनीकी गड़बड़ी पैदा की. कोलेंडर ने कहा, "अगर कोई देश खुलकर अपनी क्षमताओं या विशेष अभियानों का विवरण देता है, तो वह ऐसी तकनीक, पहुंच के बिंदु या ख़ुफिया स्रोत उजागर करने का जोखिम उठाता है जिन्हें विरोधी जल्दी बंद कर सकते हैं." उन्होंने आगे कहा, "साइबर वॉर में किसी क्षमता की असली ताक़त अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरा पक्ष ठीक से न जान सके कि वह कैसे काम करती है." इसके बावजूद, रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की डॉ. लुईस मैरी ह्यूरल का कहना है कि अमेरिका जितनी जानकारी सार्वजनिक कर रहा है, उससे उन्हें कुछ हद तक हैरानी हुई है. लेकिन उनका तर्क है कि इस युद्ध ने दिखाया है कि साइबर को पारंपरिक सैन्य कार्रवाई की तरह ही चर्चा में लाया जाना चाहिए, ताकि संघर्ष से जुड़े नियम स्पष्ट रह सकें. उन्होंने कहा, "यह हमारे लिए एक अवसर है कि हम व्यापक सैन्य अभियानों और संकट की स्थितियों में साइबर से मिलने वाले समर्थन और रणनीतिक लाभ पर अधिक सार्वजनिक बहस करें." उन्होंने कहा, "अगर साइबर को हमले का अभिन्न हिस्सा खुले तौर पर माना जाए, तो इससे सशस्त्र संघर्ष की परिभाषा जैसे सवाल और स्पष्ट हो सकते हैं." इमेज स्रोत, AFP via Getty Images इस जंग का एक उलझाने वाला पहलू यह है कि साइबर क्षेत्र में ईरान की भूमिका अब तक काफी हद तक दिखाई नहीं दी है. ईरान को लंबे समय से एक सक्षम साइबर शक्ति माना जाता है. पश्चिमी साइबर सुरक्षा जगत, सरकारों से जुड़े हैकरों की ओर से हमलों के लिए तैयार भी है, लेकिन अब तक गतिविधि बहुत कम दिखी है. यह मानना मुश्किल लगता है कि इस युद्ध में ईरान साइबर का इस्तेमाल न कर रहा हो. ये संभव है कि या तो इसराइल के कथित हमलों ने ईरान की क्षमता को प्रभावित किया है या फिर उसकी ताक़त का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर किया गया था. ईरान की प्रतिष्ठा पहले के हमलों से बनी है. ईरान ने साल 2012 में सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको के ख़िलाफ़ 'वाइपर' मैलवेयर का इस्तेमाल करके 30,000 कंप्यूटर नष्ट कर दिए गए थे. बुधवार को ख़बर आई कि ईरान से जुड़े एक हैकिंग समूह हैंडाला ने मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनी स्ट्राइकर पर तथाकथित वाइपर मैलवेयर से हमला किया. वाइपर हमलों के अलावा, ईरान पर अहम राष्ट्रीय ढांचे में हस्तक्षेप करने की कोशिश करने के आरोप भी लगे हैं ताकि शारीरिक नुकसान पहुंचाया जा सके. ह्यूरल चेतावनी देती हैं कि ईरान की हैकर समूहों के जरिए जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता को कम करके नहीं आंकना चाहिए. उन्होंने कहा, "मैं ईरान के बारे में जल्दी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचूंगी, क्योंकि हमने काफ़ी हैक्टिविस्ट गतिविधि देखी है और सार्वजनिक रिपोर्टों में पहले भी दिखाया गया है कि कभी-कभी देशभक्ति दिखाने वाले हैकर समूहों की पहचान का इस्तेमाल सरकार से जुड़े समूहों के लिए आड़ के रूप में किया जाता है." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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