'इतना भयानक सूखा कभी नहीं देखा': लातूर में कैसे हैं हालात? ग्राउंड रिपोर्ट
"पहले भी कई बार सूखा पड़ा है, लेकिन ऐसा सूखा कभी नहीं देखा. इतना भयानक सूखा हमने पहले कभी नहीं देखा." "हमने 1972 का सूखा भी देखा था. उस साल पोला त्योहार की पारंपरिक पूजा के बाद बारिश हो गई थी. इसलिए हमें सूखे का असर उतना महसूस नहीं हुआ. लेकिन इस साल का सूखा... हे भगवान!" इतना कहते हुए दामोदर चव्हाण आसमान की तरफ़ देखते हैं और प्रार्थना करते हुए हाथ जोड़ लेते हैं. उनकी बातें और अनुभव बताते हैं कि इस साल के सूखे ने लोगों को किस क़दर प्रभावित किया है. 75 साल के दामोदर चव्हाण लातूर ज़िले की रेणापुर तहसील के गरसुली गांव में रहते हैं. बारिश न होने के कारण उनके दो एकड़ खेत में लगी सोयाबीन की फ़सल सूख गई है. चव्हाण कहते हैं, "डेढ़ से दो महीने से बारिश नहीं हुई है. बीच-बीच में बस हल्की बारिश हुई. गांव में बारिश होती है, लेकिन खेतों में नहीं होती. इधर होती है, उधर नहीं होती. यही स्थिति है." "अगर बारिश हुई होती, तो एक एकड़ से कम से कम 12 से 15 बोरी सोयाबीन निकलती. अब शायद तीन या चार बोरी ही मिल पाएगी. सोयाबीन की फ़सल की हालत देखिए. फलियां कहां हैं?" फ़सल कितनी बुरी तरह प्रभावित हुई है, यह दिखाने के लिए चव्हाण अपने खेत से सोयाबीन का एक पौधा उखाड़ते हैं. साल 2016 में लातूर शहर के लिए लगभग 340 किलोमीटर दूर सांगली ज़िले के मिरज से ट्रेन के ज़रिए पीने का पानी लाया गया था. साल 2026 में लातूर ज़िले में सामान्य से लगभग 53 फ़ीसदी कम बारिश हुई है. एक जून से 21 अक्तूबर के बीच ज़िले में औसतन 764 मिलीमीटर बारिश होने की उम्मीद थी. लेकिन इस दौरान केवल 362 मिलीमीटर बारिश हुई. इस वजह से लातूर ज़िले के किसान और आम लोग बड़े संकट का सामना कर रहे हैं. गरसुली गांव के खेतों में घूमने पर हर तरफ़ सूखी हुई फ़सलें दिखाई देती हैं. किसानों का कहना है कि पिछले साल अरहर के जो पौधे आठ फ़ुट तक ऊंचे हो गए थे, इस साल वे मुश्किल से दो फ़ुट तक पहुंच पाए हैं. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. स्थानीय प्रशासन के मुताबिक़, बारिश न होने के कारण लातूर ज़िले में क़रीब 80 फ़ीसदी फ़सलें ख़राब हो गई हैं. किसान विष्णु पवार कहते हैं, "एक एकड़ में सोयाबीन उगाने पर क़रीब 20 हज़ार रुपये का ख़र्च आता है. अब कमाई से ज़्यादा खेती की लागत हो गई है. बारिश बिल्कुल नहीं हुई. इस खेत से कोई पैदावार मिलने की लगभग कोई उम्मीद नहीं है." गरसुली गांव से महज़ एक किलोमीटर की दूरी पर गरसुली लघु सिंचाई परियोजना है. स्थानीय लोगों का कहना है कि एक साल पहले तक यह जलाशय लबालब भरा था. आज यह पूरी तरह सूख चुका है. सूखी ज़मीन में दरारें पड़ गई हैं. लातूर के कई दूसरे जलाशयों की स्थिति भी ऐसी ही है. गरसुली जलाशय की जल भंडारण क्षमता 20 लाख घन मीटर है. इसके पानी से 1,222 एकड़ ज़मीन की सिंचाई होती है. लेकिन अब जलाशय सूख चुका है. ऐसे में आसपास के चार से पांच गांवों के सामने गंभीर संकट खड़ा होने की आशंका है. दत्तात्रय देशमुख अपने मवेशियों को चराने के लिए इसी सूखे जलाशय में लेकर आए थे. वह कहते हैं, "मैंने इतना भयानक सूखा कभी नहीं देखा. अब जानवरों को इस सूखे जलाशय के गड्ढों में पानी तलाशना पड़ रहा है. हालात बहुत ख़राब हैं." पड़ोसी बीड ज़िले की कैज तहसील के धनेगांव में बना मांजरा बांध इस इलाक़े में पानी की आपूर्ति करता है. पिछले साल 21 अक्तूबर को इस बांध में उसकी कुल क्षमता का 94 फ़ीसदी पानी था. आज बांध में केवल 7.84 फ़ीसदी पानी बचा है. मांजरा बांध से लातूर, बीड और धाराशिव ज़िलों में खेती और पीने के लिए पानी दिया जाता है. लातूर ज़िला प्रशासन ने शहर में पानी की आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ा दिया है. एक अक्तूबर से शहर के लोगों को चार दिन में एक बार मिलने के बजाय छह दिन में एक बार पानी मिल रहा है. लातूर के ज़िलाधिकारी डॉ. भरत बस्तेवाड कहते हैं, "पहले अनुमान था कि उपलब्ध पानी दिसंबर तक चलेगा. पानी बचाने के लिए हमने शहर में चार दिन की जगह छह दिन में एक बार पानी देना शुरू किया. इससे हम कम से कम 15 जनवरी तक पानी की आपूर्ति कर पाएंगे." "लातूर को पानी देने वाले मांजरा बांध के डेड स्टोरेज का पानी जून तक चलने का अनुमान था. अब हम उपलब्ध पानी की योजना और प्रबंधन इस तरह करेंगे कि यह जुलाई तक चले." मराठवाड़ा क्षेत्र के आठ ज़िलों में लातूर में बारिश की सबसे अधिक, 53 फ़ीसदी कमी दर्ज की गई है. लातूर ज़िले के नौ बड़े बांधों में से पांच में अब पानी का कोई भंडार नहीं बचा है. दस साल पहले, 2016 में लातूर शहर को ट्रेन से लाए गए पानी पर निर्भर रहना पड़ा था. साल 2016 में मांजरा बांध सूखने के बाद फ़रवरी में लातूर की नियमित पाइपलाइन जलापूर्ति रोक दी गई थी. उस साल सूखे के दौरान शहर को 20 दिन में केवल एक बार पानी मिलता था. पर्यावरण विशेषज्ञ और लातूर के रहने वाले अतुल देऊलगांवकर कहते हैं, "हमें पांच दिन, आठ दिन, 15 दिन या 20 दिन में एक बार पानी मिले, यहां हमेशा से पानी की आपूर्ति का यही चक्र रहा है. कुछ भी नहीं बदलता." "बांध 100 फ़ीसदी भरा हो या 80 फ़ीसदी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. हमें कभी एक दिन छोड़कर पानी नहीं मिलता." "इससे पता चलता है कि हमारी जल प्रबंधन व्यवस्था कैसे काम करती है. यह साफ़ तौर पर बताता है कि हमारा जल प्रबंधन कितना प्रभावी है और बीते 10 वर्षों में हमने क्या हासिल किया है या क्या हासिल नहीं कर पाए हैं." प्रशासन के मुताबिक़, लातूर ज़िले में इस समय 100 से 125 दिनों तक चलने वाला चारा उपलब्ध है. ज़िला प्रशासन चारे की कमी से निपटने के लिए एक आपात योजना तैयार कर रहा है. लेकिन किसान इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आगामी रबी के मौसम में क्या होगा. दामोदर चव्हाण कहते हैं, "अब हम रबी की बुआई कैसे करें? कुओं और बोरवेल में पानी नहीं है. आसपास के किसी भी कुएं को देख लीजिए. कहीं पानी नहीं है." किसान विष्णु पवार कहते हैं, "अब हमें जो भी मदद मिल सकती है, उसके लिए हम सरकार के भरोसे हैं. इस गांव में कुछ नहीं बचा है." "तालाब सूख चुके हैं, कुओं में पानी नहीं है, बोरवेल ने काम करना बंद कर दिया है और सोयाबीन की फ़सल की हालत आप देख ही रहे हैं." सूखे जलाशय, कम होते नदी के पानी, बारिश के अभाव में मुरझाई फ़सलें और चिंतित किसान- आज लातूर की तस्वीर यही है. दिसंबर के आख़िर तक हालात और गंभीर हो सकते हैं. कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लातूर ज़िले में सूखे की स्थिति की समीक्षा की. उन्होंने खेतों का दौरा करके ज़मीनी स्तर पर हुए नुक़सान का जायज़ा भी लिया. फडणवीस ने किसानों को भरोसा दिलाया कि सरकार मज़बूती से उनके साथ खड़ी है. महाराष्ट्र सरकार ने 305 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. राज्य में कुल 358 तहसीलें हैं. लातूर ज़िले की सभी 10 तहसीलों, लातूर, औसा, अहमदपुर, निलंगा, उदगीर, चाकुर, रेणापुर, शिरूर अनंतपाल, देवणी और जलकोट को सूखाग्रस्त क्षेत्रों की सूची में शामिल किया गया है. इन तहसीलों के किसानों, विद्यार्थियों, खेतिहर मज़दूरों, आम लोगों और मवेशियों को राहत देने के लिए 12 उपाय और रियायतें लागू की गई हैं. इनमें सूखाग्रस्त इलाक़ों में पीने के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी ख़र्च पर टैंकर उपलब्ध कराना भी शामिल है. राज्य सरकार ने सूखाग्रस्त तहसीलों के निवासियों के लिए पांच हज़ार रुपये की अग्रिम आर्थिक सहायता की घोषणा भी की है. यह रक़म दिवाली से पहले दी जाएगी. हालांकि, किसानों का कहना है कि यह सहायता पर्याप्त नहीं है. किसान, प्रति हेक्टेयर 50 हज़ार रुपये मुआवज़े की मांग कर रहे हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi