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ख़ानाबदोश ज़िंदगी: क्रिमिनल ट्राइब्स का 'कलंक' हटे 74 साल हुए पर इज़्ज़त के लिए जंग अब भी जारी

15 अगस्त 2027 को भारत की आज़ादी के 80 साल पूरे हो जाएंगे. हालांकि, भारत में कुछ समुदायों की आज़ादी का इतिहास अलग है. जब देश आज़ाद हुआ, संविधान लागू हुआ और नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए तब भी कुछ लोग इन सबसे वंचित रहे. लेकिन अंग्रेज़ों के क़ानून के तहत 'जन्मजात अपराधी' क़रार दी गई ख़ानाबदोश जनजातियों को इस कलंक से छुटकारा पाने के लिए पांच साल इंतज़ार करना पड़ा था. 31 अगस्त 1952 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 को रद्द कर दिया गया और इन समुदायों को 'आज़ाद' (लिबरेटेड) घोषित किया गया. इसलिए, 31 अगस्त 2027 को इस ऐतिहासिक घटना के 75 साल पूरे हो जाएंगे. हालांकि, सवाल अब भी बना हुआ है, क्या वे जनजातियां, जिन्हें कानून ने 'आज़ाद' कर दिया था, वास्तव में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और मानसिक रूप से मुक्त हो पाई हैं? ब्रिटिश सरकार भारत की कई घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और पारंपरिक पेशे वाले लोगों को संदेह की नज़र से देखती थी. एक स्थायी गाँव, ज़मीन, स्थायी पता और देश में आजीविका को 'सभ्य' जीवन का मानदंड माना जाता था. इसी पृष्ठभूमि में 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट बनाया गया और कुछ समुदायों को सामूहिक रूप से अपराध से जोड़ दिया गया. इस क़ानून ने किसी व्यक्ति के काम के बजाय उसके जन्म को संदेह का आधार बना दिया. आज़ादी के बाद भी इस कानून को तुरंत रद्द नहीं किया गया. क्रिमिनल ट्राइब्स लॉज (रिपील) एक्ट कानून को 31 अगस्त 1952 को रद्द किया गया था. लेकिन कानून से बनाई गई सामाजिक छवि ख़त्म नहीं हुई. लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं कि कई समुदायों के मामले में संदेह की मानसिकता और सामाजिक पूर्वाग्रह अब भी बने हुए हैं. आज़ादी के बाद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए संवैधानिक सुरक्षा, आरक्षण और शैक्षणिक-आर्थिक योजनाएं विकसित की गईं. हालांकि, आज़ाद, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए एक समान प्रशासनिक पहचान नहीं बनाई गई. कुछ समुदाय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल हैं. एक ही ऐतिहासिक समूह के समुदाय अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में दिखाई देते हैं. इसलिए, भले ही 'विमुक्त जनजातियां' एक सामाजिक समूह हैं, लेकिन उनके लिए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाना मुश्किल हो गया है. इमेज स्रोत, Frédéric Soltan/Corbis via Getty Images देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. भारत में आखिरी जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी. इसमें आज़ाद और घुमंतू समुदायों की सटीक आबादी निर्धारित करने में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया गया है. इस जनगणना के दौरान अलग-अलग राज्यों में उपलब्ध जानकारी के आधार पर आबादी का अनुमान लगाने की कोशिश की गई थी. जनगणना में जिन लोगों का नाम दर्ज नहीं होता है उन तक सरकार के कल्याणकारी काम नहीं पहुँच पाते. जिनके मुद्दे कम दिखाई देते हैं, उनके लिए अलग बजटीय प्रावधान मिलने की संभावना भी कम होती है. अलग प्रावधान न होने की वजह से संस्थागत जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं होती है. आज़ाद और घुमंतू जनजातियों के मामले में यह स्थिति दशकों से देखी गई है. यह कहना भी सही नहीं होगा कि सरकार ने इनके मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज़ किया है. केंद्र सरकार ने साल 2015 में प्रकाशित रेनके आयोग की सिफारिशों के सारांश में आज़ाद और घुमंतू समुदायों के वर्गीकरण का मुद्दा स्पष्ट रूप से उठाया था. राष्ट्रीय विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजाति आयोग (इडेट) की सिफारिशों के अनुसार, केंद्र सरकार ने आगे विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय विकास एवं कल्याण बोर्ड (डीडब्लूबीडीएनसी) का गठन किया है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी में इस बोर्ड का उल्लेख है. हाल के समय में आज़ाद, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण योजना, डीएनटी के आर्थिक सशक्तीकरण की योजना (सीईईडी), शुरू की गई है. हालांकि, यह दिशा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लागू करने में बड़ी बाधाएं हैं. कई योजनाओं के लिए जाति प्रमाण पत्र, स्थायी पता, बैंक खाता और अन्य दस्तावेज़ जरूरी होते हैं. घुमंतू जीवनशैली के इतिहास वाले समुदायों के लिए ऐसे दस्तावेज़ अक्सर सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं. इन जनजातियों का मुद्दा सिर्फ़ ग़रीबी का नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक कलंक का भी मुद्दा है. हालांकि वर्तमान पीढ़ी ने 1871 का कानून नहीं देखा है, लेकिन कुछ जगहों पर आज भी उनकी जाति का नाम संदेह पैदा करता है. इनकी लगातार शिकायत रही है कि अपराध होने के बाद कुछ समुदायों को शुरुआत में ही संदेह की नज़र से देखा जाता है. पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रियाओं, हिरासत और जेलों में अनुभवों को लेकर पारदर्शी अध्ययन की जरूरत है. इसी तरह चोरी, बच्चे के अपहरण या अन्य अफ़वाहों के आधार पर आज़ाद और घुमंतू समुदायों के लोगों के मॉब लिंचिंग का शिकार होने की घटनाओं ने सामाजिक पूर्वाग्रह के मुद्दे को और गंभीर बना दिया है. इमेज स्रोत, Frédéric Soltan/Corbis via Getty Images क्या अपराध होने पर संदिग्धों की तलाश करने के बजाय हाशिए पर पड़े कुछ समुदायों को शुरुआत में ही संदेह की नज़र से देखा जाता है? क्या पुलिस रिकॉर्ड में ऐतिहासिक पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं? क्या हाशिए पर पड़े समुदायों के युवाओं को रोजगार, शिक्षा और आवास की समस्याओं के अलावा 'संदिग्ध नागरिक' के रूप में जीने की मानसिक कीमत भी चुकानी पड़ती है? इन सवालों का जवाब तलाशने की जरूरत है. मुक्ति सिर्फ़ 1952 में कानून को रद्द करना नहीं है. मुक्ति का मतलब समाज की सामूहिक स्मृति से 'यह व्यक्ति जन्मजात अपराधी है' की सोच को मिटाना है. ऐतिहासिक रूप से कलंकित समुदायों के ख़िलाफ़ संस्थागत पूर्वाग्रह की संभावना की अधिक गंभीरता से जांच किए जाने की जरूरत है. पुलिस हिरासत और जेलों में अनुभवों पर भी एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अध्ययन जरूरी है. पुराने क़ानून से मुक्ति पा चुके जनजातियों के विकास के केंद्र में शिक्षा होनी चाहिए. बिना स्थायी घर वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा लगातार प्रभावित होती है. पारंपरिक पेशे ख़त्म हो रहे हैं, ऐसे में कई लोगों को आधुनिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश करने के लिए जरूरी शिक्षा और कौशल नहीं मिल पा रहे हैं. स्कॉलरशिप और शिक्षा से जुड़ी अन्य योजनाएं उपलब्ध हैं, लेकिन अगला लक्ष्य इससे कहीं बड़ा होना चाहिए. एक दीर्घकालिक शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है, ताकि मुक्ति पा चुके समुदायों के छात्र उच्च शिक्षा, शोध संस्थानों, चिकित्सा शिक्षा, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच सकें. इस मामले में महिलाओं की स्थिति और भी जटिल है. वे ग़रीबी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और सामाजिक कलंक समेत कई स्तरों पर संघर्ष करती हैं. इसलिए महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और उद्योग खड़े करने के लिए अलग नीतियों की जरूरत है. रोजगार के मामले में कई समुदायों के पास पत्थर का काम, लोहार का काम, हस्तशिल्प, पशुपालन, लोक कला और घूम-घूमकर किए जाने वाले पारंपरिक काम जैसी पारंपरिक हुनर भी हैं. ऐसे हुनर का दस्तावेज़ीकरण करने और उन्हें आधुनिक प्रशिक्षण, बाज़ार और तकनीक से जोड़ने की जरूरत है. इमेज स्रोत, NARINDER NANU/AFP via Getty Images 31 अगस्त 2027 को इस समुदाय की मुक्ति की 75वीं वर्षगांठ पूरी होगी. इस दिन को सिर्फ याद के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन के दिन के रूप में मनाया जाना चाहिए. इस मौक़े पर केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है. 1. राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र सर्वेक्षण मुक्ति पा चुके, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक और आबादी की स्थिति जानने के लिए वैज्ञानिक आधार पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया जाना चाहिए. विस्थापित और घुमंतू समुदायों की वास्तविक संख्या, उनकी सामाजिक स्थिति की प्रकृति और उनके भौगोलिक वितरण को समझने के लिए आगामी जनगणना प्रक्रिया में सही तरीके से जानकारी जुटाना जरूरी है. 3. वर्गीकरण की राष्ट्रीय समीक्षा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य श्रेणियों में बिखरे आज़ाद समुदायों के वर्गीकरण में मौजूद असंगतियों को दूर करने के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय समीक्षा करना जरूरी है. आज़ाद जनजातियों की सामुदायिक पहचान के आधार पर होने वाले भेदभाव, हिंसा और संस्थागत पूर्वाग्रह को रोकने के लिए प्रभावी कानूनी और प्रशासनिक सुरक्षा की जरूरत है. 5. पुलिस व्यवस्था का संवेदनशील प्रशिक्षण पुलिस, राजस्व, न्याय, जेल और स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों को इन आज़ाद जनजातियों के इतिहास और उनके संवैधानिक अधिकारों पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. 6. शिक्षा के लिए स्वतंत्र दीर्घकालिक योजना प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और शोध तक आज़ाद समुदायों के छात्रों के लिए मार्गदर्शन, छात्रावास, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण और शोध के अवसरों की एक श्रृंखला तैयार की जानी चाहिए. 7. महिलाओं के लिए अलग कार्यक्रम विमुक्त और घुमंतू समुदायों की महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, उद्यमिता और सुरक्षा के लिए अलग कार्यक्रमों की जरूरत है. मुक्ति पा चुके समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और कौशल का दस्तावेज़ीकरण किया जाना चाहिए और उन्हें आधुनिक बाज़ारों से जोड़ा जाना चाहिए. 9. सामाजिक पूर्वाग्रह के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय जागरूकता 'विमुक्त (लिबरेटेड) का मतलब अपराधी' वाला पूर्वाग्रह सिर्फ़ कानून से ख़त्म नहीं होगा. स्कूलों, कॉलेजों, मीडिया, पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों और प्रशासन के ज़रिए सामाजिक जागरूकता जरूरी है. अनुसूचित जनजातियों के मुद्दे को सिर्फ किसी एक समूह के विकास के सवाल के रूप में देखना बड़ी गलती है. यह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाइयों का सवाल है. हर नागरिक को समानता का अधिकार देने वाले संविधान के क्रियान्वयन की परीक्षा सबसे वंचित नागरिकों के जीवन से होती है. अगर किसी समुदाय को उसके जन्म के कारण संदेह की नज़र से देखा जाता है, तो केवल उस समुदाय की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भी परीक्षा हो रही है. सन 1952 में एक कानून रद्द कर दिया गया. लेकिन ग़रीबी, अशिक्षा, भूमिहीन होना, स्थायी आवास की कमी, सामाजिक कलंक और संस्थागत पूर्वाग्रह ख़त्म नहीं हुए. यही वजह है कि कानूनी मुक्ति और सामाजिक मुक्ति के बीच अब भी बहुत बड़ा अंतर है. इमेज स्रोत, Frédéric Soltan/Corbis via Getty Images इस आईने में हमें क्या दिखाई देता है? एक तरफ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, आधुनिक संविधान, सामाजिक न्याय की योजनाएं और विकास की रफ़्तार है. दूसरी तरफ ऐसे समुदाय हैं, जो अब भी सही आंकड़ों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वर्गीकरण की उलझन में फंसे हैं, स्थायी आवास और दस्तावेज़ों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और कुछ जगहों पर ऐतिहासिक संदेह की छाया में जीवन जी रहे हैं. इसलिए 31 अगस्त 2027 को केवल 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाने के बजाय इसे 'मुक्ति की अधूरी यात्रा के राष्ट्रीय पुनर्विचार दिवस' के रूप में देखने की जरूरत है. विमुक्त जनजातियां समान नागरिकता, स्पष्ट पहचान, सही आंकड़े, कानूनी सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, सम्मान और न्याय चाहती हैं. क्योंकि क़ानून ने उन्हें मुक्त कर दिया, अब समाज और राज्य उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र नागरिक के रूप में कब स्वीकार करेंगे? शायद मुक्ति के 75 साल पूरे होने का सबसे अच्छा तरीका यह सुनिश्चित करना है कि अगली पीढ़ी में किसी मुक्त बच्चे को अपने उपनाम से पहले अपनी जाति का बोझ न उठाना पड़े और अपनी जाति से पहले अपने पूर्वजों पर लगाए गए 'अपराधी' होने के इतिहास का बोझ न ढोना पड़े. क्योंकि मुक्ति का अंतिम अर्थ कानून को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा को बहाल करना है. (डॉ. विनायक मीराबाई सुभाष लश्कर बारामती के तुलजाराम चतुरचंद कॉलेज में समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.) (इस लेख में इस्तेमाल की गई कुछ तस्वीरें प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफर और संपादक सुधाकर ओल्वे के कैमरे से हैं) बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi