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नेपाल की सुरंगों में फंसे लोगों को बचाने का ऑपरेशन ख़तरनाक क्यों है?

नेपाल में बीते बुधवार को अचानक आई बाढ़ से प्रभावित 11 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के 900 से ज़्यादा कर्मचारी लापता हैं. हालांकि, अब तक ये साफ़ नहीं है कि इन प्रोजेक्ट्स की सुरंगों के अंदर फंसे लोगों की सही संख्या क्या है. नेपाली सेना के प्रवक्ता राजाराम बसनेत ने बीबीसी नेपाली को बताया था कि सोमवार शाम तक रसुवागढ़ी, लांगटांग, चिलिमे, अपर त्रिशूली 3ए और अपर त्रिशूली 3बी में रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है. हालांकि भारत और चीन के एक्सपर्ट्स की मदद से अभी रेस्क्यू की कोशिशें उन्हीं सुरंगों पर फ़ोकस हैं. लेकिन अधिकारियों और एक्सपर्ट्स ने बीबीसी से हाइड्रोपावर सुरंगों के अंदर की मुश्किलों के बारे में बात की है. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली सुरंग का मक़सद नदी से पानी को हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर जेनरेशन सेंटर तक पहुंचाना है. ऐसा सेंटर आमतौर पर पहाड़ के दूसरी तरफ़ होता है. 'रॉक एंड टनल' इंजीनियर बिप्लव घिमिरे ने बीबीसी नेपाली को बताया कि 'हाइड्रोलिक टनल' में हमेशा ख़तरा बना रहता है क्योंकि यह नदी के पास होते हैं. घिमिरे कहते हैं, "ये सुरंगें पहाड़ को काटकर बनाई जाती हैं. इनके एंट्री और एग्ज़िट पॉइंट नदी के ठीक बगल में होते हैं. अभी की समस्या यह है कि बाढ़ के बाद वहां कीचड़ घुस गया है." 'अपर त्रिशूली 3ए' से जुड़े मैकेनिकल इंजीनियर क्षितिज कोइराला ने बीबीसी नेपाली को बताया कि अंदर की असली स्थिति अभी भी पता नहीं है, लेकिन "हाइड्रोपावर टनल के स्ट्रक्चर की ख़ासियत के आधार पर अभी उम्मीद बरकरार है." देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. नेपाली सेना के प्रवक्ता राजाराम बसनेत ने बीबीसी नेपाली को बताया कि रसुवागढ़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में सुरंग का बंद हिस्सा क़रीब 250 मीटर अंदर जाने के बाद मिला, लेकिन "वहां अभी तक कोई नहीं मिला है." प्रवक्ता बसनेत ने कहा, "लांगटांग में क़रीब 65 मीटर अंदर जाने के बाद बड़े पत्थर मिले हैं. विदेशी टीमें आर्मी के साथ चिलिमे और अपर त्रिशूली फॉरेस्ट में काम कर रही हैं, जहां अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है. वहां पूरी टनल को खोला जा रहा है." आर्मी के प्रवक्ता ने बताया कि इसके अलावा, अपर त्रिशूली 3बी में सुरंग का मुंहाना ढूंढने का काम चल रहा है. वहीं 3ए प्रोजेक्ट टनल के अंदर से पानी पंप के ज़रिए निकालने की कोशिशें की जा रही हैं. हालांकि इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी हेलीकॉप्टर से ज़रूरी सप्लाई भेज रही है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि पहले से ही मुश्किल भरे हालात में काम करना कठिन है. टनल इंजीनियर घिमिरे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि अंदर रहने की जगहें नहीं हैं. पावर हाउस केबिन हैं. ऑफिस हैं. बातचीत के लिए वॉकी-टॉकी हैं. लेकिन उस समय संबंधित प्रोजेक्ट ने जो इंतज़ाम किए थे, वे अलग हो सकते हैं. " अपर त्रिशूली '3ए' की मुख्य सुरंग, जहाँ रेस्क्यू की कोशिशें चल रही हैं, ज़मीन से करीब 15 मीटर नीचे है. अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट के 'पावरहाउस' तक पहुँचने के लिए एक अंडरग्राउंड टनल का इस्तेमाल करना होगा. इसकी मुख्य सुरंग 170 मीटर लंबी है. रेस्क्यू की कोशिश की शुरुआत में, रेस्क्यू करने वालों ने एक 'केबल टनल' की पहचान की थी, यह सोचकर कि वहाँ पहुँचने का यह सबसे पास का रास्ता होगा. वो छोटी टनल भी अब पत्थरों और मिट्टी के ढेर से बनी ज़मीन से करीब 10-11 मीटर नीचे बताई जा रही है. त्रिशूली 3ए प्रोजेक्ट के सेंट्रल ऑफ़िस में काम करने वाले मैकेनिकल इंजीनियर क्षितिज कोइराला ने बताया, "रेस्क्यू की कोशिश में खुदाई का काम आसान नहीं था. उसके लिए, हमने लोकल मैनपावर का इस्तेमाल किया क्योंकि नेपाल के पास जो हेलीकॉप्टर हैं वो एक्सकेवेटर उठाकर नहीं ला पाते हैं. एक हेलीकॉप्टर ज़्यादा से ज़्यादा 3 टन ही उठा सकता है." "धन्ना साइड पर तीन एक्सकेवेटर आ गए हैं, जिन्हें हमने टनल के मुहाने तक पहुंचने के लिए बनाया है. हमने एक गैप बनाया है क्योंकि 'एल' शेप में जाना बहुत लंबा तरीका होगा. हमने बीच में छेद करके ऑक्सीजन भी भेजी है." कोइराला का कहना है कि उन्होंने 'क्राउन' नाम के ऊपरी हिस्से को बारूद से उड़ा दिया है, लेकिन अंदर अभी भी कंक्रीट के बीम और रॉड हैं, जिन्हें तोड़ना एक चुनौती है. कोइराला ने कहा, "अंदर देखने पर पता चलता है कि वहां पानी जमा हो रहा है, जिसे पंप करके बाहर निकालना होगा." उन्होंने आगे कहा कि अंदर 35 से 40 लोग फंसे हो सकते हैं. कोइराला ने कहा, "आशंका है कि सभी लोग ग्राउंड फ्लोर पर हैं क्योंकि अंदर मेंटेनेंस का काम चल रहा है. हम इस उम्मीद में काम कर रहे हैं कि मिट्टी का बहाव मुहाने तक न पहुंचा हो या बीच में कहीं रुक गया हो." इमेज स्रोत, Nagdhunga Tunnel Construction Project एक्सपर्ट्स का कहना है कि नेपाल में अक्सर विस्फोटकों के ज़रिए 'ड्रिल और ब्लास्ट' करके सुरंगें बनाई जाती हैं, और देश में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में 100 मीटर से लेकर लगभग नौ किलोमीटर लंबी सुरंगें हैं. इसके अलावा, सनकोशी-मरिन सिंचाई प्रोजेक्ट की 'डायवर्ज़न' सुरंग लगभग 13 किलोमीटर लंबी है, जबकि मेलमची ड्रिंकिंग वॉटर प्रोजेक्ट की सुरंग 26 किलोमीटर लंबी है. नागढुंगा सुरंग, जो हाईवे पर इस्तेमाल होती है और काठमांडू को जोड़ती है, 2.69 किलोमीटर लंबी है, जबकि सिद्धबाबा सुरंग, लगभग 1.1 किलोमीटर लंबी है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi