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ईरान को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर रुख़ की वजह से क्या कोई नुक़सान होगा? - द लेंस

अमेरिका और ईरान के बीच बीते कुछ दिनों में एक बार फिर सैन्य टकराव तेज़ हो गया है. जून में दोनों देशों के बीच जिस अस्थायी समझौते ने कुछ समय के लिए तनाव कम होने की उम्मीद जगाई थी, अब वही समझौता गंभीर संकट में है. दोनों देश एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं. इस बीच इनमें मध्यस्थता करने वाला पाकिस्तान लगातार दोनों पक्षों से समझौते का पालन करने की अपील कर रहा है. इस विवाद की जड़ में दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ है. यहां पैदा होने वाले कोई भी तनाव का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है. वहीं इस पूरे विवाद की शुरुआत 28 फ़रवरी से मानी जाती है, जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए थे. जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था. इसका असर तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ा. भारत अपनी ज़रूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. ऐसे में तेल महंगा होने का असर सिर्फ़ पेट्रोल और डीज़ल तक सीमित नहीं रहता. ये असर आम लोगों की जेब तक भी पहुंचता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये संघर्ष लंबा चलता है तो इसकी सबसे बड़ी आर्थिक क़ीमत भारत को कितनी चुकानी पड़ेगी? कच्चे तेल की क़ीमत में हर बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना अतिरिक्त बोझ डालती है? क्या पश्चिम एशिया में शांति की राह अब भी बची हुई है? द लेंस के आज के एपिसोड में ऐसे सभी सवालों पर चर्चा की गई. इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी, वॉशिंगटन से पत्रकार सीमा सिरोही और वरिष्ठ पत्रकार अशरफ ज़ैदी. नोट: द लेंस का ये एपिसोड गुरुवार 16 जुलाई को रिकॉर्ड किया गया है. प्रोड्यूसरः शिल्पा ठाकुर, सईदुज़्जमान बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi