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यूएई ने छोड़ा ओपेक और ओपेक प्लस का साथ, क्या ये संगठन के अंत की शुरुआत है?

इमेज स्रोत, Christopher Pike/Bloomberg via Getty Images संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने घोषणा की है कि वह प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर हो रहा है. तक़रीबन 60 साल बाद यूएई ने ये फ़ैसला तब लिया है जब ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. यूएई ने कहा है कि यह फ़ैसला उसकी "दीर्घकालिक रणनीति, इकोनॉमिक विज़न और बदलती एनर्जी प्रोफ़ाइल" को दर्शाता है. यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मज़रूई ने कहा है कि इन समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज़्यादा लचीलापन मिलेगा. ओपेक की स्थापना 1960 में पांच देशों ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने मिलकर की थी, ताकि उत्पादन का तालमेल बैठाकर तेल निर्यातकों के हितों की रक्षा की जा सके और सदस्यों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित हो. समय के साथ इस उत्पादक संघ में देशों की संख्या बदलती रही है, लेकिन पांच संस्थापक सदस्यों के अलावा इसमें अल्जीरिया, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, लीबिया, नाइजीरिया और कांगो गणराज्य भी शामिल हैं. यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ था, और इसके बाहर होने के बाद इसमें 11 सदस्य रह जाएंगे. वहीं ओपेक प्लस गठबंधन में इनके अलावा 10 ग़ैर-ओपेक सदस्य भी हैं, जिनमें रूस भी शामिल है. इमेज स्रोत, Jonathan Raa/NurPhoto via Getty Images इस फ़ैसले को इस उत्पादक संघ के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, और एक विश्लेषक ने इससे बाहर निकलने को "ओपेक के अंत की शुरुआत" बताया है. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावोनिक ने कहा कि यह गठबंधन के "अंत की शुरुआत" हो सकती है. उन्होंने कहा, "यूएई के जाने के साथ, ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15% खो देगा." इस फ़ैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है. ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन के मुताबिक़, यूएई जैसे लंबे समय से ओपेक के सदस्य के बाहर होने से समूह में अव्यवस्था पैदा हो सकती है और यह उसे कमज़ोर कर सकता है, जबकि यह समूह आम तौर पर भू-राजनीति से लेकर उत्पादन कोटा जैसे कई मुद्दों पर आंतरिक मतभेदों के बावजूद एकजुटता दिखाने की कोशिश करता रहा है. ब्लैक गोल्ड इन्वेस्टर्स के सीईओ और ओपेक के अनुभवी पर्यवेक्षक गैरी रॉस समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहते हैं कि "उन्होंने (यूएई) पिछले कुछ वर्षों से उत्पादन कोटा को नज़रअंदाज़ किया है और लगभग अधिकतम उत्पादन की नीति अपनाई है. आख़िर में, सऊदी अरब ही वास्तव में ओपेक था." "वही एक देश है जिसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता थी. रूस का शामिल होना अच्छा है, जिससे उसकी आपूर्ति बढ़ाने की क्षमता पर कुछ हद तक नियंत्रण रहता है." ओपेक के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, यूएई सालाना 29 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है. ओपेक का सबसे बड़ा उत्पादक देश सऊदी अरब सालाना 90 लाख बैरल तेल निकालता है. इमेज स्रोत, Mandel NGAN / AFP via Getty Images यूएई का बाहर होना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है, जिन्होंने पहले ओपेक पर "दुनिया का शोषण करने" का आरोप लगाया था. जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से "तेल की क़ीमत कम करने" को कहा था और टैरिफ़ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था. यूएई का यह फ़ैसला ऐसे समय आया है जब वर्ल्ड बैंक ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई है. उसका कहना है कि इसके परिणामस्वरूप इस साल ऊर्जा की क़ीमतें औसतन लगभग एक-चौथाई तक बढ़ेंगी, जबकि अहम होर्मुज़ स्ट्रेट के ज़रिए शिपिंग को युद्ध से पहले के हालात पर लौटने में छह महीने तक लग सकते हैं. वर्ल्ड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने कहा, "सबसे ग़रीब लोग, जो अपनी आय का सबसे बड़ा हिस्सा भोजन और ईंधन पर ख़र्च करते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे." होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद रहने के कारण यूएई के ओपेक छोड़ने का वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर तुरंत असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे लंबे समय में असर बढ़ सकता है. अर्थशास्त्रियों ने कहा कि इस देश ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह लंबे समय से अधिक तेल उत्पादन करना चाहता रहा है. कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुख्य जलवायु और कमोडिटी अर्थशास्त्री डेविड ऑक्सले ने कहा कि इसके बाहर होने से आने वाले दशकों में तेल की क़ीमतें कम हो सकती हैं, लेकिन बाज़ार में अस्थिरता बढ़ सकती है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi