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ईरान अमेरिका से बात करने में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखा रहा है?

इमेज स्रोत, Fatemeh Bahrami/Anadolu via Getty Image अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'पाकिस्तान के अनुरोध' पर ईरान के साथ युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा की है. लेकिन उन्होंने कहा है कि अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखेगा. ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा कि पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के अनुरोध पर वह ईरान पर हमला टाल रहे हैं. उन्होंने लिखा, "मैंने अपनी सेना को नाकेबंदी जारी रखने और बाकी सभी मामलों में पूरी तरह तैयार और सतर्क रहने का निर्देश दिया है. मैं युद्धविराम को तब तक बढ़ाऊंगा, जब तक उनकी ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आता और बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती." इस बीच, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी युद्ध जैसी कार्रवाई के बराबर है और यह युद्धविराम का उल्लंघन है. उन्होंने एक्स पर लिखा, "किसी वाणिज्यिक जहाज़ पर हमला करना और उसके चालक दल को बंधक बनाना इससे भी बड़ा उल्लंघन है. ईरान जानता है कि प्रतिबंधों को कैसे बेअसर करना है, अपने हितों की रक्षा कैसे करनी है और दबाव व धमकियों का जवाब कैसे देना है." संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने अमेरिका के युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा का स्वागत किया है और इसे तनाव कम करने वाला क़दम बताया. उन्होंने कहा कि इससे ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीति और भरोसा बनाने के लिए ज़रूरी माहौल तैयार होगा. उन्होंने कहा, "हम सभी पक्षों से अपील करते हैं कि इस प्रगति का फायदा उठाएं, ऐसे किसी भी क़दम से बचें जो युद्धविराम को कमज़ोर कर सकता है, और एक टिकाऊ व स्थायी समाधान के लिए रचनात्मक तरीके से बातचीत में शामिल हों." हालांकि युद्धविराम बढ़ा दिया गया है, लेकिन इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच दूसरे दौर की बातचीत को लेकर अब भी संशय बना हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की थी कि वह इन वार्ताओं के लिए अपने उप राष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान भेजेंगे, और अमेरिकी मीडिया के मुताबिक वेंस बुधवार सुबह पाकिस्तान पहुंचने वाले थे. लेकिन अब यह दौरा रद्द कर दिया गया है, क्योंकि अब तक मेज़बान पाकिस्तान के पास भी इस सवाल का जवाब नहीं है कि जब अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहुंचेगा, तब क्या ईरान की ओर से कोई बातचीत की मेज़ पर मौजूद होगा या नहीं. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. ट्रंप ने मंगलवार को एक इंटरव्यू में कहा था कि ईरान के पास बातचीत के लिए प्रतिनिधिमंडल भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसके बावजूद, ईरानी अधिकारियों की ओर से अमेरिका के साथ अगले दौर की बातचीत को लेकर अब तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं. पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रज़ा अमीरी मोग़दम ने कहा कि ईरान किसी भी धमकी या दबाव में आकर बातचीत नहीं करेगा. उन्होंने एक्स पर लिखा, "यह एक सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया तथ्य है कि इतनी प्राचीन सभ्यता वाला देश किसी भी तरह की धमकी या दबाव में बातचीत नहीं करता. यह एक मज़बूत, इस्लामी और धार्मिक सिद्धांत है. काश अमेरिका इसे समझ पाता." मंगलवार दोपहर को ईरान के सरकारी प्रसारक ने अपने टेलीग्राम चैनल पर जारी बयान में इस ख़बर का खंडन किया कि कोई ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद के लिए रवाना हुआ है. बयान में संसद अध्यक्ष और शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ सहित ईरानी अधिकारियों के रुख को दोहराया गया, जिसमें कहा गया है कि ईरान 'धमकियों के साए में किसी भी तरह की बातचीत स्वीकार नहीं करता.' ऐसे में सवाल उठता है कि वे कौन-से कारण हैं, जिनकी वजह से ईरान दूसरे दौर की बातचीत में शामिल होने से हिचकता हुआ दिख रहा है? ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची का कहना है कि अमेरिका की 'उकसाने वाली कार्रवाइयां और बार-बार होने वाले युद्धविराम उल्लंघन' कूटनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं. उन्होंने कहा कि ईरानी वाणिज्यिक जहाज़ों के ख़िलाफ़ 'धमकियां और हस्तक्षेप' और ईरान को लेकर 'विरोधाभासी बयान, धमकी भरी भाषा' भी इस प्रक्रिया में बाधा डाल रही हैं. ईरान और अमेरिका के बीच 12 अप्रैल को हुई पहले दौर की बातचीत बेनतीजा रही. अमेरिका को ईरान के संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) पर आपत्ति है और वह नहीं चाहता कि ईरान कभी परमाणु हथियार बनाए. ईरान ने यह भी कहा था कि जब तक लेबनान में युद्धविराम नहीं होता, वह बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा. बाद में इसराइल और लेबनान के बीच बातचीत के बाद लेबनान में भी युद्धविराम हो गया, लेकिन अब तक ईरान की शर्तों में से सिर्फ यही एक पूरी हुई है. ईरान यह भी मांग कर रहा है कि उसकी सीज़ की हुई संपत्तियां बहाल की जाएं और उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं, हालांकि इस पर बातचीत के दौरान चर्चा हो सकती है. होर्मुज़ स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण भी बातचीत में एक बड़ी बाधा के रूप में देखा जा रहा है, और पहले दौर की वार्ता के बाद से यह मुद्दा और गंभीर हो गया है. अमेरिका चाहता है कि ईरान होर्मुज़ को पूरी तरह खोल दे. जब लेबनान में युद्धविराम के बाद अब्बास अराग़ची ने होर्मुज़ स्ट्रेट को वाणिज्यिक जहाज़ों के लिए खोलने की घोषणा की, तो लगा कि हालात सामान्य हो रहे हैं. लेकिन जल्द ही स्थिति फिर बिगड़ गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी हटाने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि जब तक कोई समझौता नहीं होता, यह जारी रहेगी. इसी बीच एक घटना हुई, जिसमें अमेरिका ने ओमान की खाड़ी में ईरानी झंडे वाले एक जहाज़ पर गोलीबारी की और उसे अपने कब्ज़े में ले लिया. ईरान ने इसे न सिर्फ समुद्री डकैती और युद्धविराम का उल्लंघन बताया, बल्कि बदला लेने की भी बात की. अब हालात यह हैं कि ईरानी नेतृत्व होर्मुज़ स्ट्रेट में अमेरिकी नाकेबंदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों को लेकर गंभीर रूप से चिंतित दिखाई दे रहा है. ईरानी संसद के स्पीकर बग़र ग़ालिबाफ़ ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति युद्धविराम और नाकेबंदी के ज़रिए अपनी उकसाने वाली कार्रवाइयों को जायज़ ठहराना चाहते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान धमकियों के साथ होने वाली बातचीत को स्वीकार नहीं करता. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या इस माहौल में बातचीत संभव है या नहीं. इस स्थिति में भी, अमेरिका-ईरान वार्ता पर क़रीबी नज़र रखने वाले विश्लेषक इस बात को लेकर आशावादी दिखते हैं कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल निश्चित रूप से इस्लामाबाद पहुंचेगा. क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ एसोसिएट प्रोफ़ेसर मोहम्मद शोएब ने बीबीसी उर्दू के रोहन अहमद से कहा, "एक ईरानी के तौर पर कोई भी बातचीत के लिए बेताब दिखना नहीं चाहेगा." उनके मुताबिक ईरान की आंतरिक राजनीति भी यह मांग करती है कि उसके नेता सख़्त रुख अपनाते हुए दिखें. उन्होंने कहा, "ईरान में रूढ़िवादी यह देख रहे हैं कि इस दौर की बातचीत से उन्हें काफ़ी फायदा हो सकता है. लेबनान में युद्धविराम की उनकी मांग पूरी हो चुकी है, और अब यह साफ़ है कि वे अपनी बाकी मांगों को भी मनवाने की कोशिश करेंगे." ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ मोहम्मद फ़ैसल का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप का रवैया भी ईरान की हिचकिचाहट की एक वजह है. वे कहते हैं, "जब युद्धविराम हुआ, तो उम्मीद थी कि बातचीत होगी. फिर बातचीत का पहला दौर हुआ, और उसी दौरान ट्रंप ने ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी का एलान कर दिया और नौसैनिक नाकेबंदी युद्ध की कार्रवाई मानी जाती है." इमेज स्रोत, AFP via Getty Images मोहम्मद फ़ैसल कहते हैं, "इससे बातचीत को लेकर ईरान का भरोसा कम हुआ, इसलिए पहले दौर की वार्ता के बाद पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल उन्हें भरोसा दिलाने के मकसद से तेहरान भी गया था." वे आगे जोड़ते हैं, "ईरान ऐसे समय बातचीत नहीं करना चाहता, जब उसे सीधे तौर पर धमकाया जा रहा हो. इससे वार्ता प्रक्रिया और जटिल हो जाती है. ऐसे माहौल में अमेरिका के लिए कोई भी रियायत ईरान की हार के रूप में देखी जा सकती है." इस संदर्भ में, सोमवार को ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान में 'फ़िलहाल' शब्द अहम माना जा रहा है. अपने बयान में उन्होंने कहा, "फ़िलहाल पाकिस्तान में अमेरिका के साथ दूसरे दौर की बातचीत की हमारी कोई योजना नहीं है." यह वाक्य इस संभावना की ओर इशारा करता है कि ईरान आखिरी समय में पाकिस्तान जाने का फ़ैसला कर सकता है और दोनों देशों के बीच यात्रा भी महज कुछ घंटों की ही है. बीबीसी संवाददाता पॉल एडम्स के मुताबिक इस्लामाबाद में मंच तैयार है लेकिन मेहमान अभी तक नहीं पहुंचे हैं, और सवाल यह है कि क्या ग़ालिबाफ़ फिर आएंगे? या फिर खुद राष्ट्रपति ट्रंप आएंगे, जैसा उन्होंने सोशल मीडिया पर इशारा किया था? पॉल एडम्स के अनुसार, हालात बहुत अनुकूल नहीं दिखते, लेकिन दोनों पक्ष नहीं चाहते कि इस नाज़ुक कूटनीतिक प्रक्रिया को इस्लामाबाद में पटरी से उतारा जाए. इस्लामाबाद में जारी हलचल यह संकेत देती है कि पर्दे के पीछे किसी तरह का समझौता अंतिम रूप ले रहा है. ऐसा समझौता जिसमें दोनों पक्षों के लिए कुछ रियायतें हों, लेकिन जिसे दोनों अपनी-अपनी सफलता के रूप में पेश कर सकें. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

स्रोत: BBC Hindi