सुप्रीम कोर्ट ने हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्कैवेंजिंग) से हुई मौत मामलों को लेकर बड़ा बयान दिया है. कोर्ट ने इस मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर अक्टूबर, 2023 के फैसले से पहले मुआवजा नहीं दिया गया था, तो ऐसे मामलों में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को 30 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा.
कोर्ट ने पिछले हफ्ते मंगलवार (20 जनवरी, 2026) को स्पष्ट किया कि जिन मामलों में 2023 के फैसले से पहले 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा. यह स्पष्टीकरण इसलिए आया क्योंकि देश के अलग-अलग हाई कोर्ट इस 2023 के आदेश को अलग-अलग तरीके से लागू कर रहे थे और मुआवजे से जुड़े मामलों में कोई समान मानक नहीं था.
NALSA की याचिका पर आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश 20 जनवरी को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की याचिका पर आया, जिसमें अलग-अलग हाई कोर्ट के विरोधाभासी फैसलों का हवाला दिया गया था. देश के कुछ हाई कोर्ट ने पहले से निपटाए गए मामलों को दोबारा खोलते हुए उसमे मुआवजे को 10 लाख से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया, जबकि कुछ ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.
अधिवक्ता रश्मि नंदकुमार ने मामले पर क्या कहा?
NALSA की ओर से पेश हुईं अधिवक्ता रश्मि नंदकुमार ने कहा कि विचारों में इस तरह के भेद के कारण सिर्फ दो संभावनाएं सामने आईं. पहली यह कि 20 अक्टूबर, 2023 से पहले मैनुअल स्कैवेंजिंग या खतरनाक सफाई के काम के दौरान मौत के शिकार हुए व्यक्ति के आश्रितों को अगर 10 लाख रुपये का मुआवजा मिल चुका है, तो वे अतिरिक्त 20 लाख रुपये के हकदार होंगे. जबकि दूसरी संभावना यह है कि उन्हें कोई अतिरिक्त मुआवजा नहीं मिलेगा.
वहीं, सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी के रूप से सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि 10 लाख रुपये का मुआवजा साल 2014 के मार्च महीने के एक पूर्व फैसले के मुताबिक दिया गया था. उन्होंने दलील दी कि अगर उस फैसले का पालन हो चुका है, तो ऐसे मामलों को दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर 2023 के फैसले से पहले मौत हुई हो, लेकिन उनके आश्रितों को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला, तो ऐसे मामलों को नई मुआवजा व्यवस्था के तहत देखा जाना चाहिए.
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स्रोत: ABP Hindi