नेपाल बाढ़ : 'मेरे भाई ने मेरे बेटे को अपनी आंखों से दबते देखा'
राजा कुमार अपने घर में अकेले बैठे हैं. बिहार के रक्सौल के लाला छपरा गांव स्थित तीन कमरों का छोटा सा घर उनको काटने को दौड़ रहा है. घर के आंगन में नागपंचमी के दौरान गाड़ा गया ध्वजा (बांस में लाल रंग का लगा एक कपड़ा) उन्हें बार-बार अपनी मां मानती देवी की याद दिला रहा है. वह शून्य में ताकते हुए कहते हैं, "मम्मी नागपंचमी को नेपाल से इस वाले घर में आई थीं. घर साफ़ करके पूजा पाठ किया था. हम ही मम्मी को यहां से नेपाल ले गए थे. काश हम मम्मी को नहीं ले जाते तो वो ज़िंदा रहतीं." राजा की सिर्फ़ मां ही नहीं बल्कि उनकी तीन बहनें संध्या, रूपा, आशा और संध्या की दो साल की बेटी आयुषी नेपाल में आई बाढ़ में लापता हैं. नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ में राजा के परिवार की सभी महिलाएं लापता हैं. इस घर में सिर्फ़ राजा की एक शादीशुदा बहन रानी देवी ही बची है. नेपाल में आई बाढ़ में अब तक 1200 से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है और हज़ारों लापता है. राजा के पिता बुधन साह मूल रूप से रक्सौल के आदापुर प्रखंड के लाला छपरा गांव के रहने वाले हैं. बुधन अपने पूरे परिवार के साथ बीते चार साल से नेपाल के रसुवा ज़िले के बेत्रावती में रहते थे. वह यहां अपने बेटे राजा कुमार के साथ घूम-घूमकर कबाड़ खरीदने और बेचने का काम करते थे. बुधन साह के 6 बच्चे हैं. नेपाल में बुधन साह, उनकी पत्नी मानती देवी, एक शादीशुदा बेटी संध्या और उसकी दो साल की बेटी आयुषी, रूपा, आशा, राजा और साजन कुमार रहते थे. बुधन साह की दो बेटियों संध्या और रानी देवी की शादी हो चुकी है. रानी देवी त्रिशुली में किराना दुकान चलाने वाले अपने पति रंजय कुमार और तीन बच्चों के साथ रहती हैं. आर्थिक तौर पर बेहद कमज़ोर इस परिवार के लिए नेपाल जाकर अपनी जीविका कमाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था. राजा कुमार बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताते हैं, "हम लोग सुबह उठे और चाय पीकर चले गए. मेरा छोटा भाई साजन ट्यूशन पढ़ने चला गया था. घर पर सिर्फ़ मां और बहनें थी. हम लोग चार-पांच किलोमीटर घर से दूर थे तभी मेरी मां का फ़ोन आया कि बहुत पानी आ रहा है. हमें भी ऐसा पानी दिख रहा था जो पांच मंजिल के मकान को ढक देता. मैंने अपनी मां से कहा पहाड़ी पर भाग जाओ. लेकिन पानी कुछ सेंकेंड में ही आ गया. मम्मी का फ़ोन बंद हो गया और तब से आज तक बंद है." इमेज स्रोत, PRAKASH MATHEMA / AFP via Getty Images देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. बीती 2 अगस्त को राजा भारत लौट आए हैं. वह 26 अगस्त को आई बाढ़ के बाद अपनी मां और बहनों को ढूंढते रहे. वह बताते हैं, "जहां हम लोग रहते थे वहां करीब पांच हज़ार आदमी रहते थे. लेकिन अब वहां कुछ नहीं है. मुश्किल से 12-13 लोग बच गए हैं. हम लोग नारायणपुर घाट में भी शव देखने गए थे, लेकिन कुछ नहीं मिला. काश मैं भी मर जाता लेकिन मेरे पापा कैसे जिएंगें? हम लोगों के पास कुछ भी नहीं बचा. नेपाल का बस एक नोट बचा है." राजा की बहन रानी देवी थोड़ी थोड़ी देर पर फफक-फफक कर रो पड़ती है. रानी देवी ख़ुद भी इस हादसे से ज़िंदा बचकर आई है. उनके पति रंजय कुमार त्रिशुली के पास ही बाढ़ से आई गाद में फंस गए थे. रानी बताती हैं, "यह (पति) फंस गए थे तो नेपाल पुलिस वाला इनको निकाला. पानी जब आया तो यह मोटरसाइकिल चला रहे थे. मोटरसाइकिल छोड़कर ऊंचाई पर भागे लेकिन फिर भी फंस गए. हम लोग ठीक हैं लेकिन हम बस कहना चाहते है कि मेरी मम्मी का कोई शरीर ही लाकर दे दो. कम से कम उनका ठीक से रीति-रिवाज कर देंगे." आदापुर प्रखंड के स्थानीय नेता राकेश कुमार सिंह बीबीसी से बताते हैं, "पूर्वी चंपारण में सिर्फ़ आदापुर प्रखंड के आठ लोग लापता हैं." राजा कुमार के घर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऊंचीडीह गांव की बबिता देवी अपने चार बच्चों के साथ एक अंधेरे कमरे में बैठकर सिसकती रहती हैं. कभी उनके रोने की आवाज तेज तो कभी धीमी होती है. मुझे देखते ही उन्होनें मेरी बांह पकड़कर मुझे अपनी तरफ़ खींचा और कंधे पर अपना सिर रखकर रोने लगी. बबिता के पति उमेश प्रसाद भी रसुवा के तिमोरे की शेरपा कंपनी में टाइल्स लगाने का काम करते थे. वह बताती हैं, "मंगलवार की रात बात हुई थी. उन्होंने बच्चों का हाल-चाल पूछा था लेकिन बुधवार से उनका फ़ोन नहीं लग रहा है. तब से अब तक बात नहीं हुई है. घर वाले लोग काठमांडू गए है पता लगाने लेकिन आप लोग उन्हें खोजी. उन्हें खोजी... ढूंढ के ले आइए. घर में वही कमाने वाले हैं." बबिता के घर से कुछ कदम की दूरी पर वीर किशोर कुमार का घर है. मिट्टी से लिपे-पुते उनके घर में पूजा चल रही है और नज़दीकी रिश्तेदार जुट चुके है. वीर किशोर और उमेश प्रसाद दोनों एक ही कंपनी में टाइल्स लगाने का काम करते थे. वीर किशोर के बड़े भाई नवल किशोर कुमार जो ख़ुद नेपाल में रहकर मज़दूरी करते हैं वह अपने छोटे भाई को ढूंढ-ढूंढकर थक चुके हैं. नवल किशोर बीबीसी से कहते हैं, "सब जगह गए. लेकिन सिर्फ़ लाश ही लाश दिखती है. भाई का तो कुछ मालूम नहीं चला लेकिन बहुत सारी ख़राब हालत में लाश का वीडियो बनाकर ले आए है. समझ में ही नहीं आया कि क्या करें और यहां घर (बिहार) आकर उसकी पत्नी को क्या जवाब दें." इस घर के अंदर वीर किशोर कुमार की पत्नी प्रिया देवी अपने तीन छोटे बच्चों के साथ रो-रोकर खुद को दिलासा देने की कोशिश कर रही है. वीर किशोर का छोटा बच्चा अपनी मां को चुप कराते हुए कहता है कि "पापा आएंगे तो ट्रक (खिलौना) लाएंगे." वीर किशोर से बच्चों की बात 26 अगस्त की सुबह अपने बच्चों से बात हुई थी. पत्नी प्रिया देवी बताती हैं, "सुबह 7 बजे फ़ोन आया था तो बच्चों से बात किए थे. हम खाना बना रहे थे तो कहा कि 11 बजे फ़ोन करना. लेकिन उनका फ़ोन नहीं आया. जब बहुत देर फ़ोन नहीं आया तो मैनें फ़ोन किया लेकिन उनका फ़ोन बंद था. बाद में मालूम चला कि पानी आया है. मेरे मालिक (पति) को चाहे तो नेपाल या भारत सरकार कोना-कोना से ढूंढ कर ले आए. हमको कोई धन दौलत नहीं चाहिए, बस अपना मालिक चाहिए." दरअसल ऊंचीडीह गांव से नेपाल बार्डर महज़ दो किलोमीटर दूर है. गांव के पूर्व वार्ड सदस्य भूलन सहनी बताते हैं, "यहां के लोग जब कमाने लायक हो जाते हैं तो नेपाल ही कमाने जाते हैं. सब लोग वहीं जाकर मज़दूरी करते हैं. ये लोग भी जो रसुवा गए थे उन्हें 1500 नेपाली रूपया मिलता था जो भारत में तकरीबन 900 रूपये के बराबर होगा. सालों से जाते रहे हैं लोग लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है." रक्सौल बाजार से कुछ दूरी पर पनटोका पंचायत है. इस पंचायत के 23 साल के राहुल कुमार सिंह भी नेपाल में एंडीज़ नाम की कंपनी में काम करते थे. इस कंपनी में राहुल के चाचा और उनके चचेरे भाई भी उनके साथ काम करते थे. राहुल के चाचा और चचेरे भाई वापस लौट आए हैं. लेकिन राहुल नहीं लौटा. ये लोग राहुल की मृत्यु की ख़बर लेकर लौटे हैं. राहुल के पिता धर्मनाथ सिंह ने कुश (एक तरह की घास) का पुतला बनाकर उसका अंतिम संस्कार बीती 31 अगस्त को कर दिया है. क्या राहुल के जीवित लौटने की कोई उम्मीद नहीं? इस सवाल पर धर्मनाथ सिंह कहते हैं, "जब मेरे भाई ने अपनी आंखों से देख लिया कि राहुल दब गया है तो मुझे लौटने की कोई उम्मीद नहीं. इसलिए पंडित जी को बुलाकर सब कुश का पुतला बनाकर सब संस्कार करवा रहे हैं. उसका शरीर भी जाने कब लौटेगा? आप बताइए मैं किस उम्मीद पर इंतज़ार करूं?" बिहार के पूर्वी और पश्चिम चंपारण ज़िले से बड़ी तादाद में लोग नेपाल में मज़दूरी करने जाते है. अब इन परिवारों को सिर्फ़ अपनों का इंतज़ार है. या तो उनके चमत्कारिक रूप से ज़िंदा लौट आने का या कम से कम उनकी मृत देह का. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi