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Death

आईडीबीआई बैंक को 52 हजार करोड़ रुपये में ख़रीदने वाले प्रेम वत्स कौन हैं

✍️ Admin 📅 17 October, 2026 ⏰ 02:36 PM 👁 36 views

महज आठ डॉलर जेब में लेकर हैदराबाद से कनाडा के लिए निकले अरबपति उद्योगपति प्रेम वत्स अब आईडीबीआई बैंक के मालिक होंगे. प्रेम वत्स कनाडा के वॉरेन बफेट कहे जाते हैं और 100 अरब डॉलर के फ़ेयरफैक्स फ़ाइनेंशियल होल्डिंग्स के मालिक हैं. 1985 में एक छोटी इंश्योरेंस कंपनी के तौर पर शुरू हुई फ़ैयरफ़ैक्स प्रेम वत्स की क़ारोबारी सूझबूझ, दूरदृष्टि और अनुशासन की बदौलत एक विशाल फ़ाइनेंशियल कंपनी में तब्दील हो चुकी है. प्रेम वत्स की ये कंपनी आईडीबीआई बैंक की 60.72 फ़ीसदी हिस्सेदारी के लिए 52,878 करोड़ रुपये अदा करेगी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ ये भारत की सबसे बड़ी क्रॉस-बॉर्डर बैंकिंग डील है. आइए जानते हैं कौन हैं प्रेम वत्स और उन्होंने इतना बड़ा बिज़ने साम्राज्य कैसे खड़ा किया. इकोनॉमिक टाइम्स एक रिपोर्ट और प्रेम वत्स की किताब 'द फ़ेयरफैक्स वे' के मुताबिक़, वह भारतीय मूल के उद्योगपति हैं और वो 1970 के दशक में हैदराबाद से कनाडा पहुंचे थे. वत्स चुपचाप अपना काम करते हैं. मीडिया के ग्लैमर से दूर रहने वाले वत्स ने फ़ेयरफैक्स के शुरुआती 15 वर्षों में शायद ही किसी रिपोर्टर से बात की हो. निवेशकों के साथ कॉन्फ़्रेंस कॉल भी उन्होंने 2001 में ही शुरू कर की थी. वत्स की ख्याति एक 'वैल्यू इनवेस्टर' के तौर पर है. उनके मेंटर जॉन वाटसन ने उन्हें बेंजामिन ग्राहम की वैल्यू इनवेस्टिंग के गुर सिखाए. बेंज़ामिन ग्राहम का सिद्धांत कहता है कि 'मजबूत बुनियाद वाली उन कंपनियों में निवेश करो, जिनकी क़ीमत कम आंकी जा रही है और उसमें लंबे वक़्त बने रहो.' दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों में से एक वॉरेन बफेट भी कमोबेश इसी तरह के निवेश के पैरोकार हैं. इन्हीं सिद्धांतों पर चलकर प्रेम वत्स ने ऐसी कई कंपनियों में निवेश किया जो आज उनके लिए सोने की खान साबित हो रही हैं. यही वजह है कि वत्स कनाडा के वॉरेन बफेट कहे जाते हैं. भारत के हैदराबाद शहर में 1950 में पैदा हुए प्रेम वत्स के पिता स्कूल टीचर थे. उन्होंने हैदराबाद पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की. ये वही स्कूल है जहां से माइक्रोसॉफ़्ट के सीईओ सत्या नडेला, एडोबी के सीईओ शांतनु नारायण और वर्ल्ड बैंक ग्रुप के चेयरमैन अजय बंगा ने पढ़ाई की है. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वत्स ने आईआईटी मद्रास से पढ़ाई की और फिर आईआईएम की परीक्षा पास की. लेकिन वत्स की क़िस्मत कहीं और लिखी थी. वत्स के बड़े भाई कनाडा में रह रहे थे और उनके पिता चाहते थे कि छोटा बेटा भी कनाडा में जाकर करियर बनाए. वत्स ने अपनी किताब 'द फ़ेयरफैक्स वे' में लिखा है, ''मुझे कनाडा में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं भारत नहीं छोड़ना नहीं चाहता था लेकिन 22 साल की उम्र में आप अपने पिता की सुनते हैं.'' कनाडा पहुंचकर उन्होंने वेस्टर्न ओंटारियो यूनिवर्सिटी से एमबीए किया. अपनी पढ़ाई का ख़र्चा निकालने के लिए उन्होंने एयर कंडीशनर और फर्नेस बेचे. वत्स के मुताबिक़, एक सेल्समैन की विनम्रता और मेहनत बाद में उनके बहुत काम आई. प्रेम वत्स पारिवारिक मूल्यों को बहुत ज़्यादा तवज्जो देते हैं. इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक़, वत्स के पिता कहा करते थे कि 'इतनी मेहनत करो जैसे मानो सबकुछ तुम पर टिका हो और इतनी तन्मयता से प्रार्थना करो जैसे सबकुछ ईश्वर पर टिका हो.' वत्स ने 1974 में कन्फ़ेडरेशन लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनी में एक रिसर्च एनालिस्ट के तौर पर अपना करियर शुरू किया था. 1984 में उन्होंने अपनी कंपनी हैम्बलिन वत्स इनवेस्टमेंट काउंसल लिमिटेड खोली. एक साल बाद ही उन्हें एक बड़ी क़ामयाबी मिली जब उन्होंने डूबती हुई ट्रक इंश्योरेंस कंपनी मर्केल फ़ाइनेंशियल को खरीदा. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. प्रेम वत्स की क़ामयाबी का सबसे बड़ा फॉर्मूला उन संघर्ष कर रही कंपनियों में छिपा था, जिनकी बुनियाद मजबूत थीं. उनमें ऐसी कंपनियों की पहचान की ज़बरदस्त क्षमता थी और उनमें लंबे समय तक निवेश बरकरार रखने का धैर्य भी. वत्स वक़्त की नब्ज़ पहचानने में भी माहिर हैं. संकट की आहट उन्हें दूर से सुनाई पड़ने लगती है. अपनी इसी क्षमता के बूते उन्होंने 1987 के अंतरराष्ट्रीय शेयर मार्केट क्रैश (ब्लैक मंडे के रूप में चर्चित) , 1990 में जापानी अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने और 2008 के के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट यानी सब प्राइम क्राइसिस को पहचान लिया था. प्रेम वत्स ने इस दौर में अमेरिकी स्लोडाउन का फ़ायदा उठाया और ऐसी कंपनियों के शेयर बहुत कम दाम में ख़रीदे जिनमें भविष्य में अच्छा करने का दम था. हालांकि फ़ेयरफैक्स को झटके भी लगे. हार्वी, इरमा, मारिया जैसे तूफ़ानों और कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में लगी आग से कंपनी को भारी नुक़सान हुआ. कोविड-19 में इसके लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुई, जब इसके इंश्योरेंस बिज़नेस को बड़ा घाटा हुआ. लेकिन इन झटकों से उबरने की प्रेम वत्स की काबिलियत ने फ़ेयरफ़ैक्स को फिर पटरी पर ला दिया. अक्तूबर 2022 की तुलना में 2025 में फ़ेयरफैक्स की वैल्यू चार गुना हो चुकी थी. फ़ेयरफैक्स की बिजनेस स्ट्रेटजी क़ामयाब रही है. कंपनी क्लेम देने से पहले ही इतना इंश्योरेंस प्रीमियम इकट्ठा करके उन्हें उन कंपनियों में निवेश करने में क़ामयाब रही है जिनकी बुनियाद मजबूत है लेकिन शेयर सस्ते हैं. बिज़नेस और इंडस्ट्री में असाधारण योगदान को देखते हुए प्रेम वत्स पदम श्री से सम्मानित हो चुके हैं. आईडीबीआई बैंक में निवेश फ़ेयरफ़ैक्स का अब तक का सबसे बड़ा निवेश होगा. हालांकि भारतीय बाज़ार में उन्होंने फेयरफ़ैक्स इंडिया होल्डिंग के नाम से 2014 में क़दम रख दिए थे. प्रेम वत्स के बेटे बेन वत्स यहां मार्वल कैपिटल नाम की फ़ंड मैनेजमेंट कंपनी चलाते हैं जो सिर्फ़ भारतीय कंपनियों के शेयर में निवेश करती है. फ़ेयरफ़ैक्स ने भारत में आईईएफ़एल को उस समय पैसे दिए थे जब ये गोल्ड लोन बिजनेस में रेगुलेटरी दिक्कतों का सामना कर रही थी. कंपनी का बेंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड में भी मेजॉरिटी हिस्सेदारी है. कंपनी ने समर केमिकल्स और कुछ दूसरी मैन्युफै़क्चरिंग कंपनी में भी निवेश किया है. हालांकि रेगुलेटरी ज़रूरतों की वजह से इसने इससे पहले सीएसबी बैंक में किए गए अपने निवेश को घटा दिया है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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