टाइटैनिक पर सवार इकलौता काला यात्री कौन था?
10 अप्रैल 1912 को उस समय का सबसे आधुनिक जहाज़ अपनी पहली यात्रा पर इंग्लैंड के साउथैम्प्टन से रवाना हुआ. न्यूयॉर्क जा रहे आरएमएस टाइटैनिक पर 2,201 लोग सवार थे. चार दिन बाद उत्तरी अटलांटिक महासागर में यह जहाज़ एक हिमखंड से टकराया और डूब गया. टाइटैनिक की यह कहानी अनगिनत बार और कई तरीक़ों से बताई जा चुकी है. उस दौर की अख़बारी रिपोर्टों से लेकर लियोनार्डो डिकैप्रियो की बड़ी हॉलीवुड फ़िल्म तक, इस हादसे पर बहुत कुछ लिखा और दिखाया गया. लेकिन इस हादसे में मारे गए क़रीब 1,500 लोगों में शामिल एक शख़्स की कहानी लंबे समय तक लगभग भुला दी गई. फिर एक दिन एक समाजशास्त्री लिवरपूल के एक संग्रहालय पहुंचीं और उनकी नज़र इस कहानी पर पड़ी. इमेज स्रोत, National Museums Liverpool उनका नाम जोसेफ़ फ़िलिप लेमर्सियर लारोश था. टाइटैनिक की पहली यात्रा पर सवार यात्रियों में वह इकलौते काले व्यक्ति थे, जिनका दस्तावेज़ों में ज़िक्र मिलता है. लेकिन वह कौन थे? किस्मत ने ऐसे कौन से मोड़ लिए कि 25 साल के लारोश अपने परिवार के साथ व्हाइट स्टार लाइन के उस जहाज़ पर पहुंच गए, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह डूब ही नहीं सकता? लारोश का जन्म 1886 में हैती के कैप-हैतीयन में हुआ था. वह हैती के पहले सम्राट जाँ-जाक देसालिन के परपोते थे. देसालिन ने फ़्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ हैती की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व किया था. लारोश एक रसूखदार और संपन्न परिवार में बड़े हुए. 15 साल की उम्र में वह एक शिक्षक के साथ फ़्रांस पहुंचे, ताकि यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकें. फ़्रांस पहुंचने के क़रीब 11 साल बाद टाइटैनिक हादसे में लारोश की मौत हो गई. दस्तावेज़ों के मुताबिक़, वह इस जहाज़ पर सवार इकलौते काले यात्री थे. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. लंबे समय तक भुला दी गई लारोश की कहानी आख़िरकार तब सामने आई, जब डॉक्टर कारलेट नॉरवुड को लिवरपूल के मैरीटाइम म्यूज़ियम की यात्रा के दौरान उनके बारे में पता चला. वॉशिंगटन डीसी में जन्मीं नॉरवुड ने इसके बाद लारोश की ज़िंदगी पर काम शुरू किया. दो साल पहले उन्होंने लारोश पर एक नाटक लिखा और उसका निर्देशन भी किया. 17 अक्तूबर को लिवरपूल में पहली बार इस नाटक का मंचन होना है. इससे पहले नॉरवुड ने बीबीसी से लारोश के जीवन की जटिल कहानी साझा की. यह कहानी एक रसूखदार परिवार से शुरू होती है, एक साहस भरी प्रेम कहानी से गुज़रती है और आख़िर में एक त्रासदी पर ख़त्म होती है. लारोश 1901 में फ़्रांस पहुंचे थे. उस समय फ़्रांसीसी उपनिवेशों में गुलामी ख़त्म हुए मुश्किल से 50 साल हुए थे. उन्होंने पेरिस के पास बोवे में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई की और इंजीनियर बने. नॉरवुड कहती हैं, "1900 के दशक की शुरुआत में फ़्रांस में किसी काले व्यक्ति के लिए हालात बेहद नस्लवादी थे." "उस समय फ़्रांस में लोग सचमुच मानते थे कि काले लोगों की पूंछ होती है." "उन्हें वहां नस्ल के कारण काफ़ी तनाव और भेदभाव का सामना करना पड़ा." उस दौर के फ़्रांस में अलग-अलग नस्लों के किसी जोड़े के सामने कई मुश्किलें आ सकती थीं. इसके बावजूद लारोश की मुलाक़ात जूलियट लाफ़ार्ग से हुई. वह एक श्वेत फ़्रांसीसी महिला थीं. दोनों ने शादी कर ली. नॉरवुड उनके बारे में कहती हैं, "उस समय किसी काले व्यक्ति के साथ प्रेम संबंध रखने का साहस दिखाने वाली वह ज़रूर एक असाधारण महिला रही होंगी." "केवल इतना ही नहीं, उनके परिवार ने भी उनका साथ दिया क्योंकि दोनों उनके पिता के साथ रहते थे." " ये बात तो तय है कि लाफ़ार्ग के परिवार ने उनके रिश्ते का साथ दिया था. क्योंकि इसका ज़िक्र उस पत्र में मिलता है, जो लाफ़ार्ग ने लारोश के बारे में अपने पिता को लिखा था और जो आज भी सुरक्षित है." "उनके पिता के लिए लारोश की त्वचा के रंग से ज़्यादा अहम यह था कि वह पढ़े-लिखे थे." दोनों की दो बेटियां हुईं. उनके नाम सिमोन मैरी ऐन आंद्रे लारोश और लुईज़ लारोश थे. सिमोन का जन्म 1909 और लुईज़ का जन्म 1910 में हुआ था. हालांकि, कुछ समय बाद ही लारोश ने अपने परिवार के साथ अपने देश हैती लौटने की योजना बना ली. नॉरवुड कहती हैं, "लारोश अपनी डिग्री हासिल करने में कामयाब रहे, लेकिन उनके लिए नौकरी कर पाना बड़ा मुश्किल था." "उन्हें अक्सर नौकरी से निकाल दिया जाता था. नौकरी मिलने पर भी उन्हें नस्लीय दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता था." परिवार ने 1912 के आख़िर में फ़्रांस छोड़ने की योजना बनाई थी. लेकिन जब लाफ़ार्ग अपने तीसरे बच्चे की मां बनने वाली थीं तो उन्होंने जल्दी जाने का फ़ैसला किया. नॉरवुड बताती हैं, "वह नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा फ़्रांस में पैदा हो और वहीं बड़ा हो." "वह हैती लौटना चाहते थे. वह अपनी मां के बेहद क़रीब थे और उन्हें उनकी बहुत याद आती थी." नॉरवुड के मुताबिक़, हालांकि लाफ़ार्ग अपने पिता को फ़्रांस में छोड़कर जाने को लेकर चिंतित थीं. लेकिन उस समय हैती के राष्ट्रपति और जोसेफ़ के चाचा सिनसिनैटस लेकोंत ने उनके लिए गणित के शिक्षक की नौकरी का इंतज़ाम कर दिया. इसके बाद परिवार ने हैती लौटने का फ़ैसला कर लिया. इमेज स्रोत, Photo12/Universal Images Group via Getty Images लेकिन यह परिवार टाइटैनिक पर कैसे पहुंचा? फ़्रांस से तय समय से पहले निकलने के फ़ैसले से लेकर दूसरे जहाज़ के टिकट और टाइटैनिक पर सवार होने से लगभग चूक जाने तक, नॉरवुड कहती हैं, "उन्हें उस जहाज़ पर होना ही नहीं था." "लारोश की मां ने परिवार के लिए एसएस फ़्रांस जहाज़ के फ़र्स्ट क्लास टिकट भेजे थे." "लेकिन जब उन्हें पता चला कि एसएस फ़्रांस में बच्चे उनके साथ बैठकर खाना नहीं खा सकेंगे तो उन्होंने फ़र्स्ट क्लास के वे टिकट बदलकर टाइटैनिक के सेकंड क्लास के टिकट ले लिए." किस्मत ने दूसरी बार उस समय करवट ली, जब परिवार उस जहाज़ पर सवार होने जा रहा था, जिसका सफ़र तबाही में ख़त्म होने वाला था. टाइटैनिक को फ़्रांस के शेरबुर्ग बंदरगाह पर रुकना था. लेकिन वह इतना बड़ा था कि बंदरगाह तक नहीं आ सकता था. इसलिए शेरबुर्ग से सवार होने वाले यात्रियों को एसएस नोमैडिक नाम के छोटे जहाज़ से टाइटैनिक तक पहुंचाया गया. नॉरवुड कहती हैं, "उन्हें एक नाव से जहाज़ तक जाना पड़ा." "जिस नाव पर वे सवार थे, उसके इंजन में ख़राबी आ गई और वे टाइटैनिक पर चढ़ने से लगभग चूक गए." 14 अप्रैल 1912 की रात क़रीब 11 बजकर 40 मिनट पर टाइटैनिक हिमखंड से टकरा गया. लारोश ने अपनी पत्नी को जगाया. दोनों ने कुछ क़ीमती सामान इकट्ठा किया और सो रही बेटियों को गोद में लेकर जहाज़ के सबसे ऊपरी डेक पर पहुंचे. गर्भवती लाफ़ार्ग और दोनों बच्चियों को लाइफ़बोट में जगह मिल गई. अगले दिन आरएमएस कारपैथिया ने उन्हें सुरक्षित बचा लिया. मगर जोसेफ़ के साथ क्या हुआ, यह कभी पता नहीं चला. नॉरवुड के लिए लारोश की कहानी को "बिना कुछ बढ़ा-चढ़ाकर" बताने की अहमियत केवल एक व्यक्ति का इतिहास जानने तक सीमित नहीं है. वह कहती हैं, "यह कहानी हर किसी को अपनी ओर खींचती है क्योंकि यह टाइटैनिक की विरासत का हिस्सा है." "लेकिन हममें से बहुत से काले लोग अपना इतिहास नहीं जानते." "गुलामी की उस व्यवस्था की वजह से कोई रिकॉर्ड नहीं रखे गए, जिसमें इंसानों को संपत्ति समझा जाता था." "इसलिए हमें अपने अतीत और अपनी पहचान के बारे में बहुत कम जानकारी है." नॉरवुड आगे कहती हैं, "लारोश की कहानी बताती है कि काले लोगों की ऐसी अहम कहानियां भी मौजूद हैं और हमारी पहचान केवल गुलामी तक सीमित नहीं है." "ऐसे लोग भी थे, जो आगे बढ़ रहे थे और बेहद कामयाब थे." "यह कहानी हमें अपने अतीत से जोड़ती है." "ज़रूरी नहीं कि हमारा जोसेफ़ लारोश से कोई रिश्ता हो, लेकिन हम उनसे जुड़ाव महसूस कर सकते हैं." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
स्रोत: BBC Hindi