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मोदी समेत दुनिया के ये बड़े नेता यूएन महासभा को संबोधित करने क्यों नहीं गए

✍️ Admin 📅 26 September, 2026 ⏰ 10:00 AM 👁 62 views

संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र चल रहा है. यह संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का अंतिम महासभा सत्र है. गुटेरस का कार्यकाल रिकॉर्ड संख्या में वैश्विक संकटों, संघर्षों, महामारियों, जलवायु आपदाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक अहम दौर से भरा रहा. बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र का अध्यक्ष चुना गया है. वह नए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चयन की प्रक्रिया की निगरानी करेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएन की इस महासभा को संबोधित नहीं करने गए. लेकिन इस लाइन में पीएम मोदी के अलावा भी कई बड़े नाम शामिल हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो अमेरिकी दौरे पर होने के बावजूद इसमें शरीक नहीं हुए. आइए जानते हैं कि वे कौन से नेता हैं जो यूएन महासभा को संबोधित करने नहीं गए और क्या कारण हैं. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों में अपेक्षाकृत कम ही शामिल हुए हैं. उन्होंने आख़िरी बार 2021 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दिया था. इसके बाद से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र लगातार विदेश मंत्री एस. जयशंकर को वहाँ भेजता रहा है. दक्षिण भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार डेक्कन हेरल्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''इस साल शुरुआत में नरेंद्र मोदी को 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में 25 सितंबर को भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य देने वाले वक्ता के तौर पर सूचीबद्ध किया गया था. संयुक्त राष्ट्र वक्ताओं की सूची तभी जारी करता है, जब संबंधित देश बोलने के लिए समय मांगता है. संयुक्त राष्ट्र अपनी ओर से मनमाने तरीक़े से यह सूची तैयार नहीं करता. इसका मतलब है कि मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाने का अपना फ़ैसला बदल दिया, जिससे जयशंकर के नाम एक रिकॉर्ड दर्ज हो गया.'' देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. ''विजयालक्ष्मी पंडित ही एकमात्र अन्य भारतीय हैं, जिन्होंने पाँच बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था. हालांकि, उन्होंने लगातार पाँच बार ऐसा नहीं किया था. इसके अलावा, इन पांचों मौक़ों पर वह भारत के विदेश मामलों से जुड़े प्रतिष्ठान का हिस्सा भी नहीं थीं. 1963 में 18वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते समय पंडित महाराष्ट्र की राज्यपाल थीं.'' डेक्कन हेरल्ड में राजनयिक विश्लेषक केपी नायर ने लिखा है, ''जयशंकर को यहाँ एक फ़ायदा है, क्योंकि अगले साल वह कूटनीतिक जीवन के 50 साल पूरे कर लेंगे, जहाँ इस तरह की सामाजिक बातचीत उनके रोज़मर्रा के काम का हिस्सा रही है. हाई सोसाइटी की बातचीत कठिन कूटनीति को प्रभावित कर सकती है और राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है.'' केपी नायर ने लिखा है, ''जब तक मोदी इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं करते, तब तक केवल अटकल ही लगाई जा सकती है कि क्या यही वजह है कि वह हर साल यूएनजीए में अपने विदेश मंत्री को नेतृत्व की भूमिका देते हैं. इस भूमिका के लिए एक प्रशिक्षित राजनयिक ज़्यादातर पेशेवर भारतीय राजनेताओं की तुलना में अधिक उपयुक्त होता है.'' ''भारत 2028 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट के लिए चुनाव लड़ने की योजना बना रहा है. सुरक्षा परिषद की सीटों के लिए अभियान आमतौर पर विदेश मंत्री के नेतृत्व में चलाए जाते हैं. प्रधानमंत्री कभी-कभार ही इसमें सीधे हस्तक्षेप करते हैं. एक पेशेवर राजनयिक और विदेश मंत्री इस महत्वपूर्ण अभियान को 'हाई-लेवल वीक' के दौरान आगे बढ़ाने के लिए सबसे उपयुक्त हैं, क्योंकि यह सप्ताह इसके लिए काफ़ी अवसर उपलब्ध कराता है.'' जर्मन प्रसारक डीडब्ल्यू ने लिखा है, ''फ्रेडरिक मर्ज़ अपने कार्यकाल के दूसरे साल में हैं. अंतरराष्ट्रीय मंच पर ज़्यादा सक्रिय होना चाहते हैं और ख़ुद को "विदेश नीति वाला चांसलर" बता चुके हैं. लेकिन घरेलू राजनीति उन्हें व्यस्त रख रही है. सितंबर में जर्मनी के तीन राज्यों में संसदीय चुनाव हुए और फ्रेडरिक मर्ज़ पर चांसलर और क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन के नेता के तौर पर पहले से कहीं ज़्यादा दबाव है. सैक्सोनी-अनहाल्ट और बर्लिन में सीडीयू को सत्ता से बाहर कर दिया गया, जबकि मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया में वह राज्य विधानसभा में प्रवेश तक नहीं कर पाई. यूनियन रिपब्लिक जर्मनी की स्थापना के बाद यह पहली बार हुआ है. मर्ज़ घरेलू स्तर पर संकट सुलझाने में जुटे हैं और ऐसा लगता है कि वह अपनी ग़ैर-मौजूदगी में विरोधियों को विद्रोह की योजना बनाने से रोकना चाहते हैं. उनकी जगह जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल यूएनजीए में बोलेंगे. इटली की प्रधानमंत्री मर्ज़ की तुलना में काफ़ी मज़बूत स्थिति में हैं, लेकिन उन्होंने कहा है कि इस सप्ताह उन्हें घरेलू मामलों पर ध्यान देना ज़रूरी है. जुलाई की शुरुआत में नेटो शिखर सम्मेलन के बाद जॉर्जिया मेलोनी ने कहा था कि वह हाल ही में कई अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों में हिस्सा लेकर लौटी हैं और उन्हें इटली से जुड़े कई लंबित मुद्दों सहित कई मामलों से निपटना है. उन्होंने यह भी कहा था कि मर्ज़ भी 2025 में यूनएनजीए में शामिल नहीं हुए थे. इस बार मेलोनी भी अपनी जगह विदेश मंत्री एंतोनियो ताजानी को भेज रही हैं. दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति हाल ही में भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे. उन्होंने कहा कि वह स्वास्थ्य कारणों से संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल नहीं होंगे. डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने और स्वास्थ्य लाभ के लिए समय देने की सलाह दी है. रामाफोसा के कार्यालय ने उनकी स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी. दक्षिण अफ़्रीका का प्रतिनिधित्व भी विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला करेंगे. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी की जगह प्रधानमंत्री मुस्तफा मदबूली यूएनजीए में देश का प्रतिनिधित्व करेंगे. अल-सिसी के कार्यालय ने उनकी ग़ैर-मौजूदगी की कोई वजह नहीं बताई. 2014 में सत्ता संभालने के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रपति नियमित रूप से यूएन महासभा में शामिल होते थे. 2020 में कोविड महामारी के कारण कार्यक्रम ऑनलाइन हुआ था और अगले साल यह हाइब्रिड तरीक़े से आयोजित किया गया था, जिसमें अल-सिसी ने पहले से रिकॉर्ड किया गया वीडियो संदेश भेजा था. महासभा के फिर से प्रत्यक्ष रूप से आयोजित होने के बाद से वह इसमें शामिल नहीं हुए हैं. नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला टिनूबू इस साल यूएन महासभा में शामिल नहीं होने वाले तीसरे प्रभावशाली अफ्रीकी नेता हैं. नाइजीरियाई मीडिया के मुताबिक़, उनके प्रवक्ता ने कहा कि पश्चिम अफ्रीकी देश का पूरी तरह और प्रभावी तरीक़े से प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति काशिम शेट्टीमा करेंगे. इस बीच टिनूबू छुट्टी पर हैं. उन्होंने अगस्त के आख़िर में ब्रिटेन में समय बिताया और इसके बाद फ़्रांस चले गए. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग़ैर-मौजूदगी पर इस साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़ास नज़र है. इस साल के "हाई-लेवल वीक" के दौरान शी अमेरिका में थे लेकिन न्यूयॉर्क नहीं गए. जिनपिंग वॉशिंगटन से वापस लौट आए. यहाँ उनके लिए व्हाइट हाउस में राजकीय रात्रिभोज और सैन्य परेड सहित पूर्ण राजकीय यात्रा का कार्यक्रम था. शी और ट्रंप के बीच व्यापार संबंधों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ताइवान की सुरक्षा स्थिति सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद हैं. शी जिनपिंग ने आख़िरी बार 2015 में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में व्यक्तिगत रूप से संबोधन दिया था. यह संयुक्त राष्ट्र की 70वीं वर्षगांठ का साल था. उन्होंने 'विश्व फासीवाद-विरोधी युद्ध में जीत' में चीन की भूमिका पर ज़ोर दिया था. यह दूसरे विश्व युद्ध का संदर्भ था. साथ ही, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में चीन की नेतृत्वकारी भूमिका के लिए बीजिंग की वैधता को भी रेखांकित किया था. एशिया निक्केई ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''यूएन महासभा में शामिल नहीं होने से जोखिम भी कम हो जाता है. आम बहस के दौरान कोई अन्य विश्व नेता अप्रत्याशित रूप से चीन की आलोचना कर सकता है. 2015 में शी की न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर चीन विरोधी प्रदर्शनों ने भी व्यापक ध्यान खींचा था.'' रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी संयुक्त राष्ट्र के इस प्रतिष्ठित मंच पर बहुत कम ही दिखाई देते हैं, इसलिए इस साल रूस की ओर से विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ का बोलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. व्लादिमीर पुतिन ने आख़िरी बार 28 सितंबर 2015 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लिया था. यह 70वें यूएनजीए सत्र का मौक़ा था. 2005 के बाद वार्षिक आम सभा में यह उनकी पहली व्यक्तिगत मौजूदगी थी. 2015 के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा से दूर रहने के लिए पुतिन ने कोई एक स्पष्ट और लगातार आधिकारिक वजह नहीं बताई है. यह सिलसिला यूक्रेन युद्ध से पहले का है. वह 2016 से 2019 के बीच भी न्यूयॉर्क में होने वाली वार्षिक महासभा में शामिल नहीं हुए और आम तौर पर रूस का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ को सौंपा. यूएनजीए कभी भी पुतिन के लिए नियमित मंच नहीं रहा. 2015 से पहले भी वह कभी-कभार ही महासभा में शामिल हुए थे. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से 2000, 2003, 2005 और 2015 में ही हिस्सा लिया था. 2015 की उनकी यात्रा संयुक्त राष्ट्र की 70वीं वर्षगांठ और सीरिया को लेकर एक बड़े कूटनीतिक प्रयास के साथ हुई थी. इसलिए यह एक नियमित दौरे के बजाय एक असाधारण यात्रा थी. महमूद अब्बास ऊपर बताए गए नेताओं में सबसे ज्यादा यूएनजीए अनुभव रखने वाले नेता हैं. फ़लस्तीनी प्राधिकरण के राष्ट्रपति, जो 2005 से पद पर हैं, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल तक नियमित रूप से महासभा में शामिल होते रहे थे. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल उन्हें राजनयिक वीजा देने से इनकार कर दिया था और इस साल भी ऐसा ही किया है. हालांकि1947 के यूएन मुख्यालय समझौते के तहत अमेरिका विदेशी प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है. फ़लस्तीनियों के मामले में अमेरिकी विदेश विभाग ने हाल ही में कहा कि वह उन प्रतिबंधों को बढ़ा रहा है, "जो फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन और फ़लस्तीनी प्राधिकरण के सदस्यों को वीज़ा देने से रोकते हैं." अब्बास इस साल भी पिछले साल की तरह वीडियो संदेश के जरिए वहां मौजूद राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को संबोधित करने की योजना बना रहे हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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